भाकृअनुप-सीआईएआरआई, श्री विजयपुरम एवं एफएसआई द्वारा समुद्री संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण पर जागरूकता को बढ़ावा

भाकृअनुप-सीआईएआरआई, श्री विजयपुरम एवं एफएसआई द्वारा समुद्री संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण पर जागरूकता को बढ़ावा

15 मई, 2026, अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह

भाकृअनुप–केन्द्रीय द्वीप कृषि अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-सीआईएआरआई), श्री विजयपुरम, ने मत्स्य सर्वेक्षण भारत (एफएसआई) के सहयोग से आज एफएसआई, श्री विजयपुरम में “संकटग्रस्त प्रजाति दिवस” का आयोजन किया। कार्यशाला-सह-जागरूकता कार्यक्रम के माध्यम से पुडुचेरी के 55 मछुआरों के साथ-साथ पांडिचेरी विश्वविद्यालय के महाविद्यालयी छात्रों एवं शोधार्थियों को समुद्री संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के प्रति जागरूक किया गया।

मुख्य अतिथि, डॉ. एम. मुरुगानंदम, प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख, मत्स्य विज्ञान प्रभाग, भाकृअनुप-सीआईएआरआई ने संकटग्रस्त जलीय प्रजातियों की स्थिति, संरक्षण तथा प्रबंधन आवश्यकताओं पर जागरूकता व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने प्रवाल भित्तियों (कोरल रीफ), मैंग्रोव, समुद्री घास क्षेत्र (सीग्रास मेडोज), मुहाना क्षेत्र (एस्टुअरी), नदियाँ, खुले महासागर तथा तटीय आवासों जैसे जलीय  पारितंत्रों की समृद्ध जैव विविधता पर प्रकाश डाला, जो समुद्री स्तनधारियों, मछलियों, क्रस्टेशियन्स, मोलस्क, समुद्री शैवाल तथा गॉर्गोनिड्स जैसी अनेक प्रजातियों को संरक्षण प्रदान करते हैं।

ICAR-CIARI, Sri Vijaya Puram and FSI Promote Awareness on Conservation of Marine Endangered Species

डॉ. मुरुगानंदम ने संकटग्रस्त प्रजातियों की विभिन्न श्रेणियों, उनके संकटग्रस्त होने के कारणों तथा वैज्ञानिक प्रौद्योगिकियों, नीतिगत ढाँचों और सामुदायिक सहभागिता द्वारा समर्थित सुदृढ़ संरक्षण प्रयासों की तत्काल आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की। “फिशिंग डाउन द ओशन” की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने समुद्री जैव विविधता पर जलवायु परिवर्तन, समुद्री प्रदूषण, आवास विनाश तथा अत्यधिक दोहन के प्रभावों को रेखांकित किया। अत्यंत संकटग्रस्त ‘वाकीटा’ तथा वैश्विक संरक्षण पहलों का उल्लेख करते हुए उन्होंने समुद्री जीवों के आकस्मिक फँसाव (बायकैच) और उलझाव को कम करने हेतु जिम्मेदार मत्स्य पालन पद्धतियों को अपनाने का आह्वान किया।

उन्होंने डुगोंग संरक्षण के लिए समुद्री घास क्षेत्रों (सीग्रास) के पुनर्वास, कछुओं के अंडे देने वाले तटों की सुरक्षा, शार्क एवं रे प्रजातियों के संरक्षण हेतु मत्स्य पालन विनियमों तथा प्रवाल भित्तियों की सहनशीलता बढ़ाने के लिए रीफ पुनर्स्थापन उपायों के महत्व पर बल दिया। उन्होंने टिकाऊ संरक्षण के लिए आवश्यक वैज्ञानिक प्रौद्योगिकियों एवं प्रबंधन उपायों पर भी प्रकाश डाला तथा अनुसंधान, नागरिक विज्ञान एवं सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से संकटग्रस्त जलीय संसाधनों के संरक्षण में भाकृअनुप-सीआईएआरआई के योगदान को रेखांकित किया।

प्रतिभागियों को सामूहिक संरक्षण प्रयासों की आवश्यकता के बारे में जानकारी दी गई, जिसमें “संकटग्रस्त प्रजाति दिवस” के महत्व तथा समुद्री संरक्षण में एफएसआई की भूमिका पर विशेष बल दिया गया। विशेषज्ञों ने सूचीबद्ध समुद्री प्रजातियों एवं उनकी प्रमुख पहचान संबंधी विशेषताओं के बारे में भी जानकारी प्रदान की।

ICAR-CIARI, Sri Vijaya Puram and FSI Promote Awareness on Conservation of Marine Endangered Species

डॉ. पी. गोविंदसामी, उपनिदेशक, मत्स्य विभाग, पुडुचेरी, ने पुडुचेरी में मत्स्य क्षेत्र की वर्तमान स्थिति पर चर्चा की, मछुआरों की सुविधा हेतु विचार-विमर्श का तमिल भाषा में अनुवाद किया तथा समुद्री संरक्षण के महत्व पर बल दिया।

श्री नेस्नास, सहायक निदेशक, मत्स्य विभाग, श्री विजयपुरम ने भविष्य में इस प्रकार के अधिक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने का आग्रह किया।

मछुआरों ने जिम्मेदार एवं संरक्षण उन्मुख मत्स्य पालन पद्धतियों के प्रति अपना मजबूत समर्थन व्यक्त किया तथा सुझाव दिया कि मत्स्य अवकाश अवधि एवं मत्स्य उपकरणों पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों की समय-समय पर वैज्ञानिक आकलन तथा बदलती जलवायु एवं मत्स्य परिस्थितियों के आधार पर समीक्षा की जानी चाहिए।

कार्यक्रम का समापन सतत मत्स्य पालन एवं समुद्री जैव विविधता संरक्षण के प्रति साझा प्रतिबद्धता के साथ हुआ।

(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय द्वीप कृषि अनुसंधान संस्थान, श्री विजयपुरम, अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह)

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