अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस 2026 के उपलक्ष्य में, भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई), बैरकपुर ने आज राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) चरण-III परियोजना के अंतर्गत निचली गंगा के दासपाड़ा घाट पर एक व्यापक रिवर रैंचिंग कार्यक्रम आयोजित किया। यह कार्यक्रम जलीय जैव विविधता संरक्षण तथा सतत नदीय मत्स्य प्रबंधन के प्रति संस्थान की प्रतिबद्धता को और सुदृढ़ करता है।
यह कार्यक्रम डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, की गरिमामयी उपस्थिति में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में एनएमसीजी के सह-प्रधान अन्वेषकों, विभिन्न प्रभागों के प्रमुखों, केंद्र प्रभारियों, वैज्ञानिकों, तकनीकी कार्मिकों, परियोजना शोधार्थियों, प्रशासनिक कर्मचारियों, क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं तथा बड़ी संख्या में स्थानीय मछुआरों ने सक्रिय भागीदारी की।
जैव विविधता संरक्षण एवं मत्स्य भंडार संवर्धन पहल के अंतर्गत निचली गंगा में लगभग 250 किलोग्राम भारतीय प्रमुख कार्प (आईएमसी) प्रजातियों की अंगुलिकाओं, जिनमें रोहू, कतला, मृगल तथा बाटा शामिल हैं, का संवर्धन किया गया। कुल मिलाकर लगभग 35,000 अंगुलिकाओं को नदी में छोड़ा गया, ताकि घटते मत्स्य भंडार की पुनःपूर्ति की जा सके, देशी मत्स्य विविधता का पुनरुद्धार हो तथा नदी पारितंत्र की पारिस्थितिकीय स्थिरता को सुदृढ़ किया जा सके। यह हस्तक्षेप एनएमसीजी कार्यक्रम के अंतर्गत संचालित आवास पुनर्स्थापन एवं मत्स्य संसाधन संवर्धन प्रयासों का एक महत्वपूर्ण घटक है।
वैश्विक स्तर पर “वैश्विक प्रभाव के लिए स्थानीय स्तर पर कार्य” विषय के साथ मनाया गया अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस 2026, पारिस्थितिक तंत्रों एवं जैविक संसाधनों के संरक्षण हेतु स्थानीय स्तर पर कार्रवाई की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
इसी संदर्भ में, एनएमसीजी एवं भाकृअनुप-सीआईएफआरआई द्वारा संयुक्त रूप से संचालित रिवर रैंचिंग कार्यक्रम गंगा बेसिन में जलीय जैव विविधता एवं पारिस्थितिकीय संतुलन की पुनर्स्थापना हेतु एक महत्वपूर्ण विज्ञान-आधारित पहल के रूप में उभरा है।
सभा को संबोधित करते हुए डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, ने कहा कि जलीय जैव विविधता संरक्षण को राष्ट्रीय नदी पुनर्स्थापन एवं आजीविका नीतियों के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “गंगा न केवल अत्यंत सांस्कृतिक महत्व की नदी है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिकीय एवं आर्थिक जीवनरेखा भी है। एनएमसीजी ढांचे के अंतर्गत वैज्ञानिक रिवर रैंचिंग यह दर्शाती है कि अनुसंधान-आधारित हस्तक्षेप किस प्रकार नीतिगत उद्देश्यों को मापनीय पारिस्थितिकीय परिणामों में परिवर्तित कर सकते हैं।
देशी मत्स्य भंडार की पुनःपूर्ति, जैव विविधता संवर्धन तथा सतत मत्स्य पालन को समर्थन प्रदान करके ऐसी पहलें पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन, ब्लू इकोनॉमी विकास तथा आजीविका सुदृढ़ता के भारत के व्यापक एजेंडे में प्रत्यक्ष योगदान देती हैं। विज्ञान, सामुदायिक सहभागिता तथा संस्थागत साझेदारियों में सतत निवेश गंगा नदी तंत्र के भविष्य के स्वास्थ्य एवं उत्पादकता को सुनिश्चित करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।”
इस कार्यक्रम ने विज्ञान-आधारित हस्तक्षेपों, रणनीतिक साझेदारियों तथा सहभागी मत्स्य शासन के माध्यम से गंगा नदी पारितंत्र के संरक्षण, पुनर्स्थापन एवं सतत प्रबंधन के प्रति भाकृअनुप-सीआईएफआरआई की निरंतर प्रतिबद्धता को पुनः पुष्ट किया। एनएमसीजी ढांचे के अंतर्गत जलीय संसाधन प्रबंधन एवं पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन के लिए साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोणों को आगे बढ़ाते हुए संस्थान नदी पुनर्जीवन, जैव विविधता संरक्षण तथा सतत अंतर्देशीय मत्स्य विकास संबंधी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को निरंतर समर्थन प्रदान कर रहा है।
(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)







फेसबुक पर लाइक करें
यूट्यूब पर सदस्यता लें
X पर फॉलो करना X
इंस्टाग्राम पर लाइक करें