15 अक्टूबर, 2026, बैरकपुर, पश्चिम बंगाल
जलवायु-अनुकूल मत्स्य पालन, नवोन्मेषी प्रौद्योगिकियों और अंतर्देशीय जल संसाधनों के सतत उपयोग पर जोर देते हुए, भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्देशीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर ने उभरती प्राथमिकताओं की पहचान करने तथा सतत मत्स्य उत्पादन, जैव विविधता संरक्षण तथा आजीविका संवर्धन के लिए रणनीतियों को मजबूत करने के उद्देश्य से ‘जलवायु परिवर्तन के युग में सतत अंतर्देशीय मत्स्य विकास’ विषय पर एक विचार-मंथन सत्र का आयोजन किया।
राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड के मुख्य कार्यकारी डॉ. बी.के. बेहरा ने मुख्य अतिथि के रूप में सत्र का उद्घाटन किया, जबकि डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सीफरी, ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। संस्थान में डॉ. बेहरा का स्वागत करते हुए, डॉ. डे ने जलवायु परिवर्तन की उभरती चुनौतियों से निपटने और सतत उत्पादन तथा आजीविका संवर्धन के लिए अंतर्देशीय मत्स्य पालन की व्यापक संभावनाओं का लाभ उठाने हेतु वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और संस्थागत सहयोग को मजबूत करने के महत्व पर जोर दिया।
सभा को संबोधित करते हुए, डॉ. बेहरा ने मछली उत्पादन बढ़ाने और मछुआरा समुदायों की आजीविका सुरक्षित करने के लिए अनुकूलनशील और सतत दृष्टिकोण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने आर्द्रभूमियों और जलाशयों में कल्चर-आधारित मत्स्य पालन की क्षमता तथा केज कल्चर पद्धतियों के विविधीकरण को अंतर्देशीय जल संसाधनों की उत्पादकता में सुधार करने के लिए आशाजनक हस्तक्षेप के रूप में रेखांकित किया, साथ ही उनके सतत प्रबंधन को सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया।
बाजार तक पहुंच की चुनौतियों के लिए प्रौद्योगिकी-संचालित समाधानों पर प्रकाश डालते हुए, डॉ. बेहरा ने पूर्व-निर्धारित मार्गों के माध्यम से दूरदराज के स्थानों से बाजारों तक जीवित मछलियों के परिवहन के लिए ड्रोन के उपयोग पर चर्चा की। उन्होंने विशेष रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र में भारी-पेलोड क्वाडकॉप्टर ड्रोन के अखिल भारतीय प्रदर्शन की वकालत की, जहां दुर्गम भूभाग और भौगोलिक अलगाव अक्सर मछलियों के समय पर परिवहन में बाधा डालते हैं। इस प्रौद्योगिकी को व्यापक रूप से अपनाने से बाजार संपर्क में सुधार हो सकता है, परिवहन में देरी कम हो सकती है और उपभोक्ताओं तक जीवित मछलियों की कुशल आपूर्ति सुगम हो सकती है।
डॉ. बेहरा ने आर्द्रभूमियों में छोटी देशी मछली प्रजातियों (एसआईएफ) के संरक्षण और उनके पालन को बढ़ावा देने के महत्व पर भी जोर दिया। उनके पारिस्थितिक महत्व को स्वीकार करते हुए, उन्होंने जलीय जैव विविधता, पोषण सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका में उनके योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने मछुआरा समुदायों के लिए पारिस्थितिक स्थिरता और आर्थिक लाभ के बीच संतुलन हासिल करने के लिए इन प्रजातियों के संरक्षण और सतत उपयोग को अंतर्देशीय मत्स्य विकास रणनीतियों में एकीकृत करने का आह्वान किया।

सतत एवं जलवायु-अनुकूल अंतर्देशीय मत्स्य पालन के लिए दूरदर्शी दृष्टिकोण पर जोर देते हुए, डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सीफरी, ने कहा कि अंतर्देशीय मत्स्य पालन का भविष्य वैज्ञानिक ज्ञान को ऐसे व्यापक स्तर पर लागू किए जा सकने वाले, जलवायु-स्मार्ट और आर्थिक रूप से व्यवहार्य समाधानों में बदलने में निहित है, जो जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और मछुआरा समुदायों दोनों को लाभ पहुंचाएं।
आर्द्रभूमियों और जलाशयों की अप्रयुक्त क्षमता का उपयोग करके, देशी छोटी मछली प्रजातियों का संरक्षण और संवर्धन करके तथा कुशल मछली परिवहन और बाजार एकीकरण के लिए उभरती प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके, हम अधिक उत्पादक, सुदृढ़ और सतत मत्स्य क्षेत्र का निर्माण कर सकते हैं। विशेष रूप से एनएफडीबी के साथ मजबूत संस्थागत भागीदारी, अनुसंधान नवाचारों को जमीनी स्तर पर प्रभाव में बदलने की प्रक्रिया को तेज करने, पोषण सुरक्षा बढ़ाने, सतत आजीविका सृजित करने और देश में समृद्ध तथा आत्मनिर्भर मत्स्य क्षेत्र के विजन में योगदान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।”
विचार-मंथन सत्र में प्रभागाध्यक्षों और वैज्ञानिकों ने उभरती अनुसंधान प्राथमिकताओं, जलवायु संबंधी चुनौतियों और अंतर्देशीय मत्स्य पालन को अधिक सुदृढ़ एवं सतत उत्पादन प्रणालियों में बदलने के अवसरों पर विचार-विमर्श किया। चर्चाओं में संस्थागत अनुसंधान को व्यावहारिक तकनीकी समाधानों, जिम्मेदार संसाधन उपयोग, जलीय जैव विविधता संरक्षण और बाजार तक बेहतर पहुंच के साथ संरेखित करने के महत्व पर प्रकाश डाला गया।
बैठक में भाकृअनुप-सीआईएफआरआई के प्रभागाध्यक्षों के साथ अन्य वैज्ञानिकों और शोधार्थियों ने भाग लिया। डॉ. डे ने संस्थान को एनएफडीबी के निरंतर सहयोग के लिए सराहना व्यक्त की और अंतर्देशीय मत्स्य विकास को मजबूत करने तथा मछुआरा समुदायों के कल्याण में सुधार के लिए बोर्ड के योगदान को स्वीकार किया।
विचार-विमर्श ने अंतर्देशीय मत्स्य पालन की क्षमता का लाभ उठाने के लिए जलवायु अनुकूलनशीलता, तकनीकी नवाचार, जैव विविधता संरक्षण और संस्थागत सहयोग को एकीकृत करने के महत्व की पुनः पुष्टि की। उत्पादक आर्द्रभूमियों और जलाशयों, देशी मछली प्रजातियों तथा ड्रोन-सक्षम परिवहन पर जोर ने ऐसे व्यावहारिक और व्यापक स्तर पर लागू किए जा सकने वाले समाधानों की आवश्यकता को रेखांकित किया, जो देशभर में मत्स्य पालन की स्थिरता, पोषण सुरक्षा और आजीविका के अवसरों को मजबूत कर सकते हैं।
(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्देशीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)








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