29 जून 2026, मोयना, पूर्व मेदिनीपुर
सतत कृषि के राष्ट्रीय मिशन को आगे बढ़ाते हुए भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई), बैरकपुर, ने आज पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले के मोयना में मेरा गांव मेरा गौरव (एमजीएमजी) पहल के अंतर्गत खेत बचाओ अभियान के तहत एक व्यापक किसान जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया। पूर्व मेदिनीपुर कृषि विज्ञान केन्द्र (बीसीकेवी), के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में 109 किसानों, अधिकारियों एवं हितधारकों, जिनमें बड़ी संख्या में मत्स्य पालक भी शामिल थे, ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
पश्चिम बंगाल के प्रमुख मीठे पानी की मछली उत्पादन क्षेत्रों में से एक के रूप में व्यापक रूप से पहचाने जाने वाला मोयना एक विशिष्ट कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्र है, जहां कृषि और मत्स्य पालन एक साथ संचालित होते हैं तथा एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। इस महत्वपूर्ण संबंध को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम में ऐसी सतत कृषि पद्धतियों की आवश्यकता पर बल दिया गया, जो न केवल फसल उत्पादकता बढ़ाएं, बल्कि तालाबों, आर्द्रभूमियों, नहरों तथा अन्य जलीय संसाधनों को कृषि रसायनों से होने वाले प्रदूषण से भी सुरक्षित रखें।ductivity but also protect ponds, wetlands, canals and other aquatic resources from agrochemical contamination.
सभा को संबोधित करते हुए डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, ने कहा, "स्वस्थ मृदा एक रणनीतिक राष्ट्रीय संपदा है, जो खाद्य सुरक्षा, जलवायु लचीलापन, पर्यावरणीय स्थिरता तथा ग्रामीण समृद्धि का आधार है। खेत बचाओ अभियान के माध्यम से हम साक्ष्य-आधारित, संसाधन-कुशल तथा जलवायु-स्मार्ट कृषि को बढ़ावा दे रहे हैं, जो संतुलित पोषक तत्व उपयोग और सतत जल प्रबंधन को प्रोत्साहित करती है। भावी पीढ़ियों के लिए आजीविका, पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य तथा कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए मृदा और जल संसाधनों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।"
तकनीकी सत्र के दौरान विशेषज्ञों ने उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से होने वाले मृदा क्षरण तथा पोषक तत्वों के असंतुलन के जोखिमों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि जल निकायों में पोषक तत्वों का बहाव यूट्रोफिकेशन (अत्यधिक पोषक तत्वों का संचय), शैवाल प्रस्फुटन (एल्गल ब्लूम), ऑक्सीजन की कमी तथा मत्स्य जैव विविधता में गिरावट का कारण बन सकता है। यह विषय विशेष रूप से मोयना के लिए महत्वपूर्ण है, जहां मत्स्य पालन आजीविका और आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख आधार है। इस अवसर पर डॉ. आनंद सिंघा, सहायक कृषि निदेशक (एडीए), मोयना ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम में हरी खाद को मृदा स्वास्थ्य पुनर्स्थापित करने की पर्यावरण-अनुकूल तथा कम लागत वाली रणनीति के रूप में भी बढ़ावा दिया गया। किसानों को ढैंचा (Sesbania aculeata/Sesbania bispinosa) के बारे में जानकारी दी गई, जो एक तीव्र गति से बढ़ने वाली दलहनी फसल है और मृदा में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ाने, पोषक तत्वों की उपलब्धता में सुधार करने तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए जानी जाती है।
संवादात्मक चर्चा सत्रों के दौरान प्रतिभागियों ने अपने खेतों के अनुभव साझा किए तथा प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए कृषि उत्पादकता बढ़ाने के व्यावहारिक उपायों पर विशेषज्ञों से मार्गदर्शन प्राप्त किया। किसानों ने ऐसी सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने में गहरी रुचि दिखाई, जो एक साथ लाभप्रदता और पर्यावरणीय स्थिरता दोनों को बढ़ावा दें।
कार्यक्रम स्थल से बाहर भी अभियान का व्यापक प्रसार सुनिश्चित करने के लिए आईसीएआर-सीआईएफआरआई ने मोयना पल्लीमंगल एफएम कम्युनिटी रेडियो के साथ साझेदारी की। इसके माध्यम से सतत कृषि, मृदा संरक्षण और मत्स्य संसाधनों की सुरक्षा से जुड़े संदेशों का प्रसारण किया गया, जिससे वैज्ञानिक जानकारी का लाभ व्यापक किसान समुदाय तक पहुंचाया जा सके।
इस पहल ने जलवायु-अनुकूल कृषि, जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण तथा कृषि एवं मत्स्य पालन समुदायों की आजीविका को सुदृढ़ बनाने के प्रति आईसीएआर-सीआईएफआरआई की प्रतिबद्धता को पुनः रेखांकित किया। बंगाल के प्रमुख मत्स्य उत्पादन क्षेत्र तक मृदा एवं जल संरक्षण का संदेश पहुंचाकर खेत बचाओ अभियान कृषि और मत्स्य पालन दोनों के लिए अधिक सतत और लचीले भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर, कोलकाता)







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