भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने 103वाँ स्थापना दिवस का धूमधाम से किया आयोजन

भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने 103वाँ स्थापना दिवस का धूमधाम से किया आयोजन

4 जुलाई, 2026, अल्मोड़ा

भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (वीपीकेएएस) का 103वाँ स्थापना दिवस संस्थान के अल्मोड़ा स्थित सभागार में धूम-धाम से मनाया गया। इस कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. लक्ष्‍मी कान्‍त, निदेशक, वीपीकेएएस, तथा अन्य गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में पारम्परिक अनुष्ठान तथा स्वामी विवेकानन्द की मूर्ति पर माल्यार्पण के साथ किया गया। अतिथियों द्वारा अल्मोड़ा परिसर में लगाये गये स्टाल का भ्रमण किया गया।

   

मुख्य अतिथि डॉ. संजय कुमार, अध्‍यक्ष, कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल, नई दिल्‍ली इस कार्यक्रम में ऑनलाईन माध्‍यम से जुड़े। अपने उद्बोधन में उन्‍होंने निदेशक डॉ. कान्‍त एवं संस्‍थान के सभी कार्मिकों को स्‍थापना दिवस की बधाई दी और कहा जिस प्रकार नालन्‍दा अपने कार्यों हेतु विश्‍वविख्‍यात है उसी प्रकार से भाकृअनुप-विवेकानन्‍द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्‍थान, अल्‍मोड़ा भी अपनी महत्‍वपूर्ण उपलब्धि के लिए विश्‍व राजधानी बनने योग्‍य है। यह संस्‍थान आज के दिन वर्तमान उत्‍सव को मनाते हुए अपने अतीत के साथ ही अपनी विरासत एवं पूर्वजों को भी नहीं भूलता और स्‍वामी जी की ऊर्जा एवं नई दृष्टि को अपने क्रियाकलापों में आत्‍मसात करता है। प्रो. सेन को श्रृद्धान्‍जलि देते हुए उन्‍होंने कहा कि कोई भी संस्‍थान राष्‍ट्र को प्रथम क्‍या देता है यह धारणा विवेकानन्‍द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्‍थान, अल्‍मोड़ा के लिए अक्षरश: सत्‍य सिद्ध होता है क्‍योंकि इस संस्‍थान ने राष्‍ट्र को संकर मक्‍का, प्‍याज, बेबीकॉर्न, द्विउद्देशीय गेहूँ, सफेद मंडुवा, चेरी टमाटर आदि की प्रथम प्रजाति दी है। उन्होंने, प्रो. एम.एस. स्‍वामीनाथन के कथन कि कृषि के लिए ऐसी नयी दृष्टि पर कार्य करना जो किसान व ग्रामीण परिवार के लिए सार्थक हो, इसको आधार मानकर संस्‍थान को कार्य करने हेतु प्रेरित किया। उनके अनुसार दृढ़ निश्‍चय के समक्ष नियति भी हार मानती है जो प्रो. सेन ने इस संस्‍थान की स्‍थापना कर सिद्ध किया।

 

डॉ. कुमार के अनुसार अलग-अलग शताब्‍दी में अलग-अलग चीजों की महत्‍ता होती है, इसी क्रम में 21वीं सदी जैविक पूंजी की सदी है, जिसमें- जंगल, नदी, औषधीय पौधे इत्‍यादि एक ऐसी पूंजी है जो कभी कम नहीं होती तथा अक्षय एवं टिकाऊ है। उन्‍होंने अनेक उदाहरणों से मूल्‍य संवर्धन द्वारा निर्यात को बढ़ावा देने पर बल दिया और कहा कि कृषि क्षेत्र में अपनी शीर्ष 10 प्राथमिकताएं निर्धारित करनी चाहिए जिनसे राष्‍ट्र की उन्‍नति सुनिश्चित की जा सके। 

 

पहले निदेशक ने संस्थान के संस्थापक प्रो. बोसी सेन को नमन करते हुए मुख्य अतिथि सहित सभी गणमान्य अतिथियों का स्वागत के साथ संस्थान की विशिष्‍ट उपलब्धियों को सबसे साझा किया। साथ ही उन्होंने विगत वर्ष के दौरान संस्थान की महत्वपूर्ण उपलब्धियों की प्रस्तुति दी। उन्‍होंने कहा कि संस्थान ने 'वीएल त्रिपोषी' और 'वीएल सुपोषिता' जैसी बायो-फोर्टिफाइड मक्का किस्मों के अलावा 'वीएल मंडुआ 410' और 'वीएल लहसुन 2' जैसी उन्नत किस्मों और 'वीएल मक्का शेलर' जैसी प्रौद्योगिकियों का विकास एवं व्यवसायीकरण किया है। संस्थान जैविक कीट प्रबंधन एवं हींग की खेती जैसी नई दिशाओं में भी सक्रिय है। संस्थान द्वारा चलाए गए 'खेत बचाओ अभियान' ने 90 कार्यक्रमों के माध्‍यम से 3,025 किसानों, जिनमें 1,616 महिला कृषक को सीधा लाभ मिला साथ ही विभिन्‍न फसलों में अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन और कृषि विषयक प्रशिक्षणों के माध्यम से इन तकनीकों को जमीनी स्तर तक पहुँचाया है।

 

विशिष्ट अतिथि डॉ. अवलोकितेश्‍वर सेन, पूर्व मुख्‍य वैज्ञानिक, सीएसआईआर–एनसीएल, पूणे द्वारा “डिवाइन सोल – बोशी सेन एवं गर्ट्यूड इमरसन सेन” विषय पर षष्‍ठम् पद्मभूषण प्रो. बोशी सेन स्‍मृति व्‍याख्‍यान दिया गया जिसमें उन्‍होंने स्‍वामी विवेकानन्‍द, स्‍वामी सदानन्‍द महाराज,  प्रो. जे.सी. बोस, सिस्‍टर क्रिस्टिन, सिस्‍टर निवेदिता, प्रो. सेन, श्रीमती गर्ट्यूड इमरसन सेन के जीवन से सम्‍बन्धित विस्‍तृत जानकारी साझा की।

डॉ. जे.सी. भट्ट, पूर्व निदेशक, भाकृअनुप-विवेकानन्‍द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्‍मोड़ा ने इस अवसर पर सभी को बधाई देते हुए इस संस्थान की उपलब्धि को अद्वितीय बताया और कहा कि संस्थान ने चुनौतियों को अवसर में बदलने के क्षेत्र में एक अनुकरणीय कार्य किया है। हींग और क्विनोवा पर किए जा रहे कार्य की सराहना करते हुए उन्‍होंने मूल्‍य संवर्धन पर बल दिया और ऐसे उत्‍पादों को स्‍थानीय बाजार तक ले जाने के प्रयास पर बल दिया।

 

डॉ. आई.डी. भट्ट, निदेशक, राष्‍ट्रीय पर्यावरण हिमालयी संस्‍थान, कोसी कटारमल ने संस्‍थान की उपलब्धियों पर हर्ष व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि एकीकृत कृषि एवं औषधीय पौध संस्‍थान का एक अच्‍छा प्रयास है तथा संस्‍थान द्वारा पोषण खाद्य एवं पारम्‍परिक फसल, कटाई उपरान्‍त प्रौद्योगिकी की दिशा में एक सराहनीय कार्य किया जा रहा है।

श्री प्रकाश जोशी, पूर्व नगरपालिका अध्‍यक्ष, अल्‍मोड़ा ने संस्‍थान के उत्‍तरोत्‍तर वृद्धि पर प्रशंसा व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि संस्‍थान की विश्‍वव्‍यापी ख्‍याती संस्‍थान के कार्मिकों की मेहनत का प्रतिफल है। उनके अनुसार स्‍वामी जी की प्रेरणा से प्रो. सेन ने इस संस्‍थान हेतु जो कल्‍पना की थी, उसमें संस्‍थान खरा उतर रहा है।

स्वामी ध्रुवेशानन्द जी, अध्यक्ष, रामकृष्ण कुटीर, अल्मोड़ा, ने  प्रो. बोशी  सेन का स्मरण करते हुए कहा कि विज्ञान और धर्म एक दूसरे के पूरक हैं। भारत में विज्ञान एवं कृषि  के विकास के विषय में जानकारी देते हुए उन्होंने संस्थान को नये अनुसंधानों हेतु बधाई दी तथा संस्थान की उत्तरोत्तर प्रगति की कामना की।

 

अतिथियों द्वारा माहवार कृषि क्रियाकलापों को दर्शाने वाले संस्‍थान के प्रकाशन “कृषक दिग्‍दर्शिका 2026-27” का विमोचन भी किया गया।

प्रगतिशील कृषकों श्रीमती गीता टम्‍टा एवं श्री जीवन लाल को सम्मानित करने के साथ ही जून 2027 तक सेवानिवृत होने वाले संस्‍थान के कार्मिकों श्रीमती राधिका आर्या, श्री रमेश चन्‍द्र पन्‍त, ई. दिनेश चन्‍द्र मिश्र, श्री धीरेन्‍द्र सिंह गोसांई, श्री नन्‍दन सिंह जीना, श्री मदन सिंह भाकुनी एवं श्री नन्‍दन लाल को सम्‍मानित किया गया।

वर्ष 2025-26 के दौरान प्रकाशित हुए तीन सर्वश्रेष्‍ठ शोध पत्रों के लेखकों डॉ. आर.पी. मीणा, डॉ. के.के. मिश्रा एनं डॉ. निर्मल कुमार हेडाऊ के साथ ही वी.एल. मधुबाला, वी.एल. सुपोषिता एवं वी.एल. लोफाई जैसे किस्मों के विकासकर्ताओं को भी प्रमाण-पत्र दिया गया।

इस अवसर पर वी. एल. मक्‍का शैलर के विपणन हेतु मैसर्स पराशर एग्रोटेक बायो प्राइवेट लिमिटेड, बनारस के साथ समझौता पत्र पर हस्‍ताक्षर भी किया गया।

 

कार्यक्रम के द्वीतीय सत्र में संस्थान की आईटी एमयू इकाई और बोशी सेन सोसाइटी फॉर सस्टेनेबल माउंटेन एग्रीकल्चर के संयुक्त तत्वावधान में एक महत्वपूर्ण विशेषज्ञ पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। इस चर्चा का मुख्य विषय "हिमालयी कृषि का पुनरुद्धार: प्रौद्योगिकी-आधारित परिवर्तन का रोडमैप" था। इसकी  अध्यक्षता डॉ. कुमार ने की।

विशेषज्ञों का मंथन चर्चा में कृषि क्षेत्र के कई विद्वान सम्मिलित हुए, जिनमें डॉ. जे.पी. टंडन, डॉ. एच.एस. गुप्ता, डॉ. श्याम कुमार शर्मा, डॉ. आर.सी. श्रीवास्तव, डॉ.  अरूणव पट्टनायक और डॉ. आर.के. मित्तल सहित 13 विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन, पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक तकनीक के समन्वय और किसानों की आय बढ़ाने के लिए कृषि-व्यवसाय मॉडलों पर विस्तार से चर्चा की।

संस्‍थान के पूर्व निदेशक एवं सेवानिवृत कर्मचारियों के साथ संस्‍थान के सभी वैज्ञानिक, अधिकारी एवं कर्मचारी इत्यादि ने व्‍यक्तिगत एवं आभासी माध्यम से इस कार्यक्रम में शिरकत की।

(स्रोतः भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा)

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