7 मई, 2026, बैरकपुर
संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, विशेष रूप से संसाधन-निर्भर ग्रामीण क्षेत्रों में, लचीली, जलवायु-स्मार्ट और सतत एकीकृत कृषि प्रणालियों के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से उत्पन्न हो रही बढ़ती पारिस्थितिक एवं आर्थिक चिंताओं को ध्यान में रखते हुए आज आईसीएआर-केंद्रीय अंतर्स्थलीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर, में ओडिशा के सुबरनपुर जिले से अंतर-राज्यीय एक्सपोजर विजिट कार्यक्रम के तहत आए 25 स्वयं सहायता समूह सदस्यों तथा मिशन शक्ति कर्मियों के लिए “एकीकृत कृषि क्लस्टर विकास हेतु उर्वरकों के संतुलित उपयोग” विषय पर एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य प्रतिभागियों को कृषि एवं मत्स्य उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ मृदा स्वास्थ्य, जल गुणवत्ता और दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता की सुरक्षा हेतु उर्वरकों के वैज्ञानिक, विवेकपूर्ण एवं आवश्यकता-आधारित उपयोग के प्रति जागरूक करना था। कार्यक्रम के दौरान हुई चर्चाओं में यह रेखांकित किया गया कि रासायनिक उर्वरकों का असंतुलित एवं अत्यधिक उपयोग न केवल मृदा क्षरण और पोषक तत्व असंतुलन को बढ़ाता है, बल्कि जलीय पारितंत्रों में बहाव को भी तेज करता है, जिससे मछलियों के स्वास्थ्य, तालाब की पारिस्थितिकी तथा समग्र कृषि स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
संवादात्मक तकनीकी सत्रों के दौरान विशेषज्ञों ने उर्वरकों के दुरुपयोग के हानिकारक परिणामों पर चर्चा की तथा कृषि प्रणालियों में पारिस्थितिक संतुलन बहाल करने के लिए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों को अपनाने की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया।
प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सिफरी ने कहा कि फसल एवं मत्स्य उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ मृदा स्वास्थ्य, जल गुणवत्ता और जलीय पारितंत्रों की सुरक्षा के लिए उर्वरकों का संतुलित उपयोग अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने चेतावनी दी कि उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग पोषक तत्वों के बहाव, पारिस्थितिक क्षरण तथा जलीय कृषि प्रणालियों में तनाव को बढ़ाता है। मृदा एवं जल परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन की वकालत करते हुए उन्होंने किसानों को जैविक खाद, जैव उर्वरक, फसल अवशेष, तालाब की गाद तथा रासायनिक उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग पर आधारित एकीकृत एवं पर्यावरण-अनुकूल पद्धतियाँ अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे सतत एवं जलवायु-सहिष्णु कृषि को बढ़ावा मिल सके।
यह जागरूकता कार्यक्रम ओडिशा के सुबरनपुर जिले से आए किसानों और मिशन शक्ति सदस्यों के ज्ञान, जागरूकता एवं निर्णय लेने की क्षमता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। संतुलित उर्वरक उपयोग एवं एकीकृत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देकर यह पहल उच्च फसल एवं मत्स्य उत्पादकता, बेहतर मृदा एवं जल स्वास्थ्य, खेती की लागत में कमी, कृषि आय में वृद्धि तथा आजीविका सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ दीर्घकालिक पारिस्थितिक स्थिरता सुनिश्चित करने में सहायक सिद्ध होगी।
(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्स्थलीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर, कोलकाता)







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