भारत सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के तटीय जलीय कृषि प्राधिकरण ने ज्ञान साझेदारी एवं तकनीकी सहयोग के लिए भाकृअनुप–सीआईबीए, चेन्नई के साथ समझौता ज्ञापन पर किय़ा हस्ताक्षर

भारत सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के तटीय जलीय कृषि प्राधिकरण ने ज्ञान साझेदारी एवं तकनीकी सहयोग के लिए भाकृअनुप–सीआईबीए, चेन्नई के साथ समझौता ज्ञापन पर किय़ा हस्ताक्षर

28 जून, 2026, फरक्का

गंगा नदी में प्रतिष्ठित हिलसा मत्स्य संसाधन के पुनर्स्थापन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए भाकृअनुप–केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप–सीआईएफआरआई), बैरकपुर ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के अंतर्गत फरक्का में हिलसा रैंचिंग कार्यक्रम का आयोजन किया। भाकृअनुप–सीआईएफआरआई के निदेशक डॉ. प्रदीप डे के मार्गदर्शन में आयोजित इस पहल का उद्देश्य प्रयागराज से फरक्का तक गंगा नदी के प्रवाह क्षेत्र में घटती हिलसा आबादी का पुनर्जीवन एवं संरक्षण करना है।

हिलसा (टेनुअलोसा इलिशा), जिसे बंगाल का गौरव माना जाता है, सांस्कृतिक, पोषणीय एवं आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मछली है। वैज्ञानिक हस्तक्षेप की आवश्यकता को देखते हुए भाकृअनुप–सीआईएफआरआई वर्ष 2020 से राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के अंतर्गत एक व्यापक हिलसा संरक्षण कार्यक्रम संचालित कर रहा है, जिसमें मत्स्य भंडार संवर्धन, आवास पुनर्स्थापन तथा सतत मत्स्य प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

कार्यक्रम की प्रमुख उपलब्धियों में गंगा नदी में स्थापित वृत्ताकार पिंजरों (सर्कुलर केज) में पाले गए 110 हिलसा शिशु मत्स्यों (जुवेनाइल्स) को सफलतापूर्वक नदी में छोड़ा जाना शामिल रहा। यह पहल हिलसा की नई पीढ़ी की संख्या बढ़ाने तथा नदी पारिस्थितिकी तंत्र में उसके मत्स्य भंडार को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण योगदान देगी।.

ICAR-CIFRI, Barrackpore Strengthens Hilsa Conservation Efforts through Ranching Programme in River Ganga at Farakka

इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. प्रदीप डे ने कहा कि गंगा में हिलसा का पुनर्स्थापन जैव विविधता संरक्षण, सतत आजीविका तथा पोषण सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करते हुए भारत की ब्लू इकोनॉमी को सुदृढ़ करने की दिशा में एक रणनीतिक कदम है। उन्होंने कहा कि विज्ञान आधारित रैंचिंग हस्तक्षेपों तथा प्रभावी आवास प्रबंधन के संयोजन से नदी आधारित मत्स्य संसाधनों का पुनर्जीवन संभव है, साथ ही इससे मत्स्यजीवी समुदायों की सामाजिक एवं आर्थिक सुदृढ़ता भी बढ़ेगी। डॉ. डे ने यह भी कहा कि फरक्का की यह पहल सतत मत्स्य विकास का एक आशाजनक एवं विस्तार योग्य मॉडल है, जो यह दर्शाती है कि पारिस्थितिक पुनर्स्थापन को समावेशी आर्थिक विकास एवं दीर्घकालिक संसाधन स्थिरता के साथ प्रभावी रूप से जोड़ा जा सकता है।

इस कार्यक्रम का आयोजन फरक्का बैराज परियोजना (एफबीपी), नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) तथा पश्चिम बंगाल सरकार के मत्स्य विभाग के सहयोग से किया गया। गृह मंत्रालय, पोत परिवहन मंत्रालय तथा विद्युत मंत्रालय के प्रतिनिधियों ने फरक्का में हिलसा संरक्षण गतिविधियों का विस्तार करने के लिए अपना समर्थन दोहराया, जबकि एनटीपीसी ने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पहलों के माध्यम से इस कार्यक्रम को और अधिक सुदृढ़ बनाने की अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।

कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने हिलसा संरक्षण कार्यक्रम की शुरुआत से अब तक की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला तथा इस महत्वपूर्ण मत्स्य संसाधन के सतत प्रबंधन के लिए भविष्य की रणनीतियों पर चर्चा की।

यह रैंचिंग पहल गंगा में हिलसा मत्स्य संसाधन के पुनर्स्थापन में महत्वपूर्ण योगदान देने के साथ-साथ स्थानीय मत्स्यजीवी समुदायों के लिए आजीविका के अवसरों को भी बेहतर बनाएगी। फरक्का मॉडल भारत की अन्य नदी प्रणालियों में भी हिलसा पुनर्स्थापन के लिए एक आशाजनक मॉडल के रूप में उभर रहा है।

(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)

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