8 मई, 2026, कोलकाता/कानपुर
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन के अंतर्गत दलहन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक समन्वित पहल के तहत, भाकृअनुप-कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-अटारी), कोलकाता, ने भाकृअनुप-भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-आईआईपीआर), कानपुर, के सहयोग से ओडिशा और पश्चिम बंगाल के कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के लिए हाइब्रिड मोड में एक अभिसरण बैठक-सह-क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य दोनों राज्यों में दलहन प्रोत्साहन के लिए तकनीकी तैयारी, संस्थागत अभिसरण तथा क्षेत्रीय स्तर पर कार्यान्वयन रणनीतियों को सुदृढ़ करना था।
भाकृअनुप-अटारी, कोलकाता के निदेशक डॉ. प्रदीप डे ने पोषण एवं प्रोटीन सुरक्षा सुनिश्चित करने, मृदा स्वास्थ्य में सुधार करने तथा सतत एवं जलवायु-सहिष्णु कृषि को बढ़ावा देने में दलहनों के रणनीतिक महत्व पर बल दिया और उन्हें कृषि आत्मनिर्भरता तथा पारिस्थितिकीय स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने केवीके से जमीनी स्तर पर दलहन खेती और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय, मिशन-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया। दलहन विविधीकरण, संतुलित उर्वरक उपयोग और आगामी खेत बचाओ अभियान के बीच घनिष्ठ संबंध पर जोर देते हुए डॉ. डे ने कहा कि फसल प्रणालियों में दलहनों का समावेश पोषक तत्वों के चक्रण को मजबूत करता है, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करता है तथा संतुलित, संसाधन-कुशल और पर्यावरण-अनुकूल पोषक तत्व प्रबंधन को समर्थन प्रदान करता है।
डॉ. जी.पी. दीक्षित, निदेशक, भाकृअनुप-आईआईपीआर, कानपुर, ने मिशन ढांचे के अंतर्गत 421 जिलों में सीएफएलडी के माध्यम से उन्नत दलहन किस्मों के प्रसार पर प्रकाश डाला। उन्होंने दलहन क्षेत्र को 5 लाख हैक्टर तक विस्तारित करने और उत्पादन में 6 लाख टन की वृद्धि के लक्ष्यों पर बल देते हुए पश्चिम बंगाल और ओडिशा के कई जिलों में राष्ट्रीय औसत से कम उपज की स्थिति का उल्लेख किया। उन्होंने क्लस्टर-आधारित प्रसार के माध्यम से अरहर, मसूर और उड़द की उच्च उपज देने वाली, कीट-प्रतिरोधी तथा जलवायु-सहिष्णु किस्मों के प्रचार-प्रसार हेतु प्रणाली-आधारित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

तकनीकी सत्रों में खरीफ दलहन खेती के लिए राज्य-विशिष्ट रणनीतियों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया। चर्चाओं में राष्ट्रीय दलहन मिशन के उद्देश्यों एवं कार्यसूची के साथ-साथ क्षेत्र-विशिष्ट दलहन उत्पादन प्रौद्योगिकियों को रेखांकित किया गया। पश्चिम बंगाल और ओडिशा के लिए उपयुक्त नव-विकसित दलहन किस्मों, दलहन उत्पादन परिदृश्य तथा सीड हब के माध्यम से बीज उपलब्धता की जानकारी भी प्रस्तुत की गई। गुणवत्तापूर्ण बीजों की समय पर उपलब्धता, जैव उर्वरकों के उपयोग, मृदा स्वास्थ्य कार्ड आधारित पोषक तत्व प्रबंधन तथा मृदा कार्बन में वृद्धि के माध्यम से दलहन आत्मनिर्भरता प्राप्त करने पर विशेष बल दिया गया। संपूर्ण कार्यक्रम का प्रभावी समन्वय सभी सत्रों के दौरान किया गया।
एक संवादात्मक प्रश्नोत्तर सत्र के माध्यम से दलहन प्रदर्शन से जुड़े केवीके प्रमुखों तथा विषय वस्तु विशेषज्ञों (एसएमएस) को तकनीकी, परिचालन तथा कार्यान्वयन संबंधी समस्याओं और प्रश्नों के समाधान का अवसर मिला, जिससे ज्ञान साझा करने और व्यावहारिक समस्याओं के समाधान को बढ़ावा मिला।
कार्यक्रम में दोनों राज्यों के दलहन उत्पादन एवं प्रदर्शन गतिविधियों से जुड़े केवीके कार्मिकों ने उत्साहपूर्वक भागीदारी की, जिससे संस्थागत क्षमता, सहयोगात्मक अभिसरण तथा दलहन आत्मनिर्भरता मिशन के लक्ष्यों को प्राप्त करने की तैयारी और अधिक सुदृढ़ हुई।
(स्रोत: भाकृअनुप-कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, कोलकाता)







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