डॉ. एम.एल. जाट ने भाकृअनुप-सीआएफआरआई की ‘वेस्ट टू वेल्थ’ प्रौद्योगिकी का अनावरण किया, जो कृषि-औद्योगिक अपशिष्ट को सतत मत्स्य आहार में करेगी परिवर्तित

डॉ. एम.एल. जाट ने भाकृअनुप-सीआएफआरआई की ‘वेस्ट टू वेल्थ’ प्रौद्योगिकी का अनावरण किया, जो कृषि-औद्योगिक अपशिष्ट को सतत मत्स्य आहार में करेगी परिवर्तित

13 जुलाई, 2026, बैरकपुर

सतत जलीय कृषि को बढ़ावा देने और भारत की परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत, भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-सीफरी), बैरकपुर, ने अपने प्रमुख प्रकाशन "वेस्ट टू वेल्थ: कृषि-औद्योगिक अपशिष्ट को किफायती एवं सतत मत्स्य आहार में परिवर्तित करना—जलीय कृषि के लिए एक परिपत्र अर्थव्यवस्था" का विमोचन किया। इस प्रकाशन का लोकार्पण डॉ. एम.एल. जाट, सचिव, डीएआरई एवं महानिदेशक, आईसीएआर द्वारा डॉ. डी.के. यादव, उप महानिदेशक (फसल विज्ञान), भाकृअनुप तथा डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सीफरी की उपस्थिति में किया गया।

सभा को संबोधित करते हुए डॉ. जाट ने कहा कि कृषि अपशिष्ट को मूल्य संवर्धित जलीय कृषि आदानों में परिवर्तित करना एक परिवर्तनकारी दृष्टिकोण है, जो संसाधन दक्षता को सुदृढ़ करता है, किसानों की आय बढ़ाता है तथा मत्स्य क्षेत्र के सतत विकास को समर्थन प्रदान करता है। उन्होंने भाकृअनुप-सीफरी  की ‘वेस्ट टू वेल्थ’ पहल की सराहना करते हुए इसे विज्ञान-आधारित नवाचार का उत्कृष्ट उदाहरण बताया, जो परिपत्र अर्थव्यवस्था, जलवायु-सहिष्णु कृषि तथा ब्लू इकोनॉमी के राष्ट्रीय विजन के अनुरूप है।

डॉ. यादव ने कहा कि ‘वेस्ट टू वेल्थ’ पहल कृषि-औद्योगिक उपोत्पादों को वैकल्पिक आहार संसाधनों के रूप में उपयोग करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति का प्रतिनिधित्व करती है, जो जलीय कृषि उत्पादन में नवाचारी, कम लागत वाले तथा सतत समाधानों का मार्ग प्रशस्त करती है।

‘वेस्ट टू वेल्थ टीम’ द्वारा विकसित यह प्रकाशन 15 वर्षों से अधिक के अग्रणी अनुसंधान का दस्तावेजीकरण करता है, जिसका उद्देश्य कृषि-औद्योगिक उपोत्पादों को पोषण-संतुलित, किफायती तथा पर्यावरणीय रूप से सतत मत्स्य आहार में परिवर्तित करना है। यह नवाचार जलीय कृषि की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक—उच्च आहार लागत—का समाधान प्रस्तुत करता है, साथ ही पारंपरिक आहार अवयवों पर निर्भरता को कम करते हुए कृषि अवशेषों के प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देता है।

इस प्रौद्योगिकी के माध्यम से धान की भूसी, टैपिओका अपशिष्ट, तेल खली, ब्रूअर का प्रयुक्त अनाज (Brewer's Spent Grain), ब्लैक सोल्जर फ्लाई (बीएसएफ) लार्वा तथा रेशमकीट प्यूपा मील सहित विभिन्न प्रकार के कृषि-औद्योगिक अपशिष्टों का सफलतापूर्वक उपयोग कर मीठे पानी की जलीय कृषि के लिए उच्च प्रदर्शन वाले आहार विकसित किए गए हैं। क्षेत्रीय प्रदर्शनों में उल्लेखनीय परिणाम प्राप्त हुए हैं, जिनमें आहार लागत में 20–30 प्रतिशत की कमी, फिश मील के 75–100 प्रतिशत प्रतिस्थापन तथा मत्स्य उत्पादन में 15–20 प्रतिशत की वृद्धि शामिल है। इससे भारत के जलीय कृषि क्षेत्र को प्रतिवर्ष अनुमानित 1,200–1,400 करोड़ रुपये का आर्थिक लाभ प्राप्त होने की संभावना है।

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भाकृअनुप-सीफरी ने इस पहल के अंतर्गत अनेक नवाचारी मत्स्य आहार उत्पाद भी विकसित किए हैं, जिनमें सीफरी कैज ग्रो फ्लोटिंग फीड, रेशमीन™) फीड श्रृंखला, ब्लैक सोल्जर फ्लाई लार्वा आधारित आहार, रेशमकीट प्यूपा मील आधारित फॉर्मूलेशन, कार्यात्मक मत्स्य आहार तथा विशेष सजावटी मछलियों के लिए विकसित आहार शामिल हैं। इन प्रौद्योगिकियों का सफलतापूर्वक परीक्षण एवं प्रमाणीकरण भारतीय प्रमुख कार्प प्रजातियों जैसे कतला, रोहू और मृगल के साथ-साथ तिलापिया, पंगासियस तथा सजावटी मछलियों पर किया गया है।

व्यापक स्तर पर अपनाने के उद्देश्य से विकसित यह उत्पादन प्रौद्योगिकी छोटे उद्यमियों के लिए प्रतिदिन 0.5 टन उत्पादन क्षमता से लेकर प्रतिवर्ष 50,000 टन तक के वाणिज्यिक उत्पादन के लिए उपयुक्त है। इसे मानकीकृत प्रसंस्करण प्रोटोकॉल का समर्थन प्राप्त है, जो गुणवत्ता, सुरक्षा, पोषक तत्वों की एकरूपता तथा विश्वसनीय प्रदर्शन सुनिश्चित करते हैं।

इस अवसर पर डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सीफरी ने कहा कि ‘वेस्ट टू वेल्थ’ पहल विज्ञान-आधारित नवाचारों के प्रति भाकृअनुप-सीफरी की प्रतिबद्धता का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो जलीय कृषि को अधिक लाभकारी, संसाधन-कुशल तथा पर्यावरणीय रूप से सतत बनाती है। उन्होंने कहा कि कृषि-औद्योगिक अपशिष्ट को मूल्यवान मत्स्य आहार में परिवर्तित कर यह प्रौद्योगिकी न केवल उत्पादन लागत को कम करती है, बल्कि ग्रामीण आजीविका के अवसर भी सृजित करती है, पर्यावरण संरक्षण को सुदृढ़ करती है तथा भारत की ब्लू इकोनॉमी में महत्वपूर्ण योगदान देती है।

यह पहल अपशिष्ट पुनर्चक्रण, संसाधन दक्षता तथा जलवायु-सहिष्णु प्रौद्योगिकियों के एकीकरण के माध्यम से सतत जलीय कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आत्मनिर्भर भारत, ब्लू इकोनॉमी तथा परिपत्र अर्थव्यवस्था आधारित कृषि विकास के लिए भारत सरकार के विजन के अनुरूप यह प्रौद्योगिकी सतत मत्स्य उत्पादन को गति देने के साथ-साथ खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा ग्रामीण समृद्धि को भी बढ़ावा देने की अपेक्षा रखती है।

(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)

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