चल रहे खरीफ मौसम पर अनियमित मौसम पैटर्न के बढ़ते खतरे के बीच, भाकृअनुप–पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्र अनुसंधान परिसर (भाकृअनुप आरसी फॉर एनईएच रीजन), नागालैंड केन्द्र, मेद्जीफेमा ने अपने मूल संस्थान भाकृअनुप–पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्र अनुसंधान परिसर, उमियाम के सहयोग से ‘खरीफ 2026 कृषि पर एल नीनो के प्रभावों को कम करने’ विषय पर एक हितधारक बैठक आयोजित की। बैठक का उद्देश्य राज्य की कृषि पर एल नीनो के प्रतिकूल प्रभावों का मुकाबला करने के लिए विज्ञान-आधारित रणनीति तैयार करना था।
अपने उद्घाटन संबोधन में डॉ. कादिरवेल गोविंदसामी, निदेशक, भाकृअनुप आरसी फॉर एनईएच रीजन, उमियाम, मेघालय, ने किसानों को प्रतिकूल मौसमीय परिस्थितियों से बचाने के लिए जलवायु सहनशीलता, अनुकूलनात्मक योजना और संस्थागत तत्परता की महत्वपूर्ण आवश्यकता पर बल दिया।
अपने समापन संबोधन में नागालैंड सरकार के संयुक्त सचिव खोंथुंगो लोथा ने वैज्ञानिकों और राज्य तंत्र के संयुक्त प्रयासों की सराहना की तथा नागालैंड के पर्वतीय क्षेत्रों में शमन रणनीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए अनुसंधान संस्थानों और क्षेत्रीय विभागों के बीच निर्बाध एवं त्वरित संवाद का आह्वान किया।
तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. गिरीश पाटिल, निदेशक, भाकृअनुप–राष्ट्रीय मिथुन अनुसंधान केन्द्र (एनआरसी मिथुन), मेद्जीफेमा, ने की। इस सत्र में विस्तृत वैज्ञानिक प्रस्तुतियां दी गईं, जिनमें व्यापक एवं आंकड़ा-आधारित वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया।
कार्यक्रम के समापन पर डॉ. गिरीश पाटिल ने विशेषज्ञ टिप्पणियाँ प्रस्तुत करते हुए जलवायु तनाव से फसलों, पशुधन तथा व्यापक जनजातीय कृषि पारिस्थितिक तंत्र की सुरक्षा के महत्व पर जोर दिया।

सत्र के दौरान नागालैंड में बदलते मौसम संबंधी मानकों, वर्षा की कमी तथा फसल उत्पादन पर तापमान से उत्पन्न खतरों का विस्तृत विश्लेषणात्मक अवलोकन प्रस्तुत किया गया।
पूर्वोत्तर क्षेत्र में अत्यधिक मौसमीय घटनाओं और उनसे जुड़ी बाधाओं से बागवानी उत्पादन की सुरक्षा के लिए रणनीतिक आकस्मिक योजनाओं पर प्रकाश डाला गया।
चर्चाओं में पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्रों में एल नीनो परिस्थितियों के लिए तैयारी पर भी विशेष ध्यान दिया गया, जिसमें तनाव-सहनशील फसल किस्मों को अपनाने, जलवायु-सहिष्णु फसलों की खेती तथा संरक्षण तकनीकों के एकीकरण पर बल दिया गया।
मृदा एवं जल संरक्षण तकनीकों के महत्व के साथ-साथ दलहनों और तिलहनों को शामिल कर फसल विविधीकरण पर भी जोर दिया गया। सत्र में नागालैंड की कृषि-जलवायु परिस्थितियों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त सात नई उच्च उत्पादकता वाली, जलवायु-सहिष्णु धान किस्मों के जारी किए जाने की भी जानकारी दी गई।
तकनीकी विचार-विमर्श के बाद कृषि एवं संबद्ध विभागों के राज्य स्तरीय अधिकारियों के साथ एक विस्तृत संवादात्मक सत्र आयोजित किया गया, जिसमें लॉजिस्टिक चुनौतियों, तकनीक-आधारित संसाधन प्रबंधन के त्वरित क्षेत्रीय क्रियान्वयन तथा जलवायु-सहिष्णु कृषि आदानों के वितरण पर चर्चा की गई।
बैठक में संयुक्त निदेशक, जिला कृषि अधिकारी (डीएओ), कृषि, बागवानी, मत्स्य एवं जलीय संसाधन विभागों के राज्य अधिकारी, एसएएस, नागालैंड विश्वविद्यालय के संकाय सदस्य, आईसीएआर नागालैंड केंद्र के वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केन्द्रों (केवीके) के प्रमुख, मुख्य तकनीकी अधिकारी, विषय वस्तु विशेषज्ञ (एसएमएस) तथा तकनीकी अधिकारियों ने भाग लिया और पूरे दिन चली विचार-विमर्श प्रक्रिया में सक्रिय सहभागिता की।







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