ल्यूसर्न किस्म आईजीएफआरआई-डीएल-2 (एडब्ल्यूसीएल-2) को वर्ष 2025 में भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र, जिसमें पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान राज्य शामिल हैं, के लिए जारी करने हेतु चिन्हित एवं अनुशंसित किया गया। यह अधिसूचना गजट नोटिफिकेशन S.O. 2128 (E), दिनांक 13 मई, 2025 के माध्यम से जारी की गई। यह किस्म आनंद-2 × वीविल चेक से विकसित जनसंख्या है। यह एक शाकीय बहुवर्षीय तथा अत्यधिक पौष्टिक चारा दलहनी फसल है, जिसे सिंचित परिस्थितियों में उगाया जाता है। इसकी ऊंचाई 85-90 सेमी तक होती है। इसके पत्ते हल्के गहरे हरे रंग के, छोटे, सीधे तथा किनारों पर दाँतेदार होते हैं। इसके फूल हल्के से मध्यम गहरे बैंगनी रंग के होते हैं तथा बीज पीले तथा मध्यम आकार के होते हैं। इसका प्रसार बीज द्वारा किया जाता है। यह किस्म प्रति वर्ष 85-90 टन/हैक्टर हरा चारा उत्पादन तथा 10-15 टन/ हैक्टर सूखा पदार्थ उत्पादन देती है। इसमें कच्चा प्रोटीन उत्पादन (सीपीवाई) 2.5-3.0 टन/हैक्टर तथा बीज उत्पादन 1.0-1.5 क्विंटल/हैक्टर दर्ज किया गया है। इसमें कच्चा प्रोटीन 16-18% तथा इन-विट्रो ड्राई मैटर डाइजेस्टिबिलिटी (आवीएमडी) 58-62% पाई गई है। इसके अतिरिक्त इसमें एसिड डिटर्जेंट फाइबर (एडीएफ) 35-40% तथा न्यूट्रल डिटर्जेंट फाइबर (एनडी डीएफ) 55-60% पाया जाता है, जो पशुओं द्वारा बेहतर पाचन एवं स्वैच्छिक सेवन के लिए उपयुक्त है। यह किस्म रस्ट एवं लीफ माइनर के प्रति प्रतिरोधी तथा वीविल एवं हेलिकोवर्पा आर्मीजेरा के प्रति मध्यम प्रतिरोधी है।

इस किस्म की व्यावसायिक उपयोगिता यह है कि यह बहुवर्षीय प्रकृति की होने के कारण चारा एवं बीज दोनों उद्देश्यों के लिए उगाई जा सकती है। इसे अत्यधिक पौष्टिक होने के कारण चारा फसलों की रानी (Queen of Forage Crops) कहा जाता है। इसमें उच्च कच्चा प्रोटीन, कैल्शियम, फास्फोरस, मैग्नीशियम जैसे खनिज तथा विटामिन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यदि इसे ल्यूसर्न के कुल खेती क्षेत्र के 25% भाग में अपनाया जाए, तो 20 लाख टन हरा चारा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इसकी सूखी पत्तियों को लीफ मील के रूप में पशुओं को खिलाया जा सकता है। इसकी उच्च स्वादिष्टता के कारण पशु इसे आसानी से स्वीकार करते हैं। इसके संभावित औषधीय उपयोग, जैसे फार्मा उद्योग में रेचक (laxative) तैयार करने में इसका उपयोग भी हैं। यह पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार करता है, गर्भधारण दर बढ़ाता है, दूध उत्पादन एवं वसा प्रतिशत बढ़ाता है, जिससे दूध का बेहतर मूल्य मिलता है तथा पशुपालकों की आय में वृद्धि होती है। यह मधुमक्खी पालन (एपियरी) के लिए भी उपयुक्त है।
(स्रोत: भाकृअनुप-भारतीय घास भूमि एवं चारा अनुसंधान संस्थान, झांसी)







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