कार निकोबार द्वीप समूह के दूरस्थ गांवों में, जहाँ कृषि लंबे समय तक पारंपरिक पद्धतियों पर आधारित केवल निर्वाह कृषि तक सीमित थी, वहाँ अब एक सकारात्मक परिवर्तन जनजातीय किसानों के जीवन को नई दिशा दे रहा है। भाकृअनुप-कृषि विज्ञान केन्द्र निकोबार द्वारा, जो भाकृअनुप-केन्द्रीय द्वीप कृषि अनुसंधान संस्थान के अंतर्गत कार्यरत है, निरंतर तकनीकी हस्तक्षेपों एवं सतत मार्गदर्शन के माध्यम से निकोबारी जनजातीय किसान कम निवेश वाली पारंपरिक खेती से विविधीकृत, बाजारोन्मुखी एवं टिकाऊ समेकित कृषि प्रणालियों की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
इस पहल ने तमालू, तापोइमिंग, बिग लापाथी तथा कार निकोबार द्वीप के अन्य गांवों में जनजातीय कृषक समुदायों की आजीविका सुरक्षा, कृषि लाभप्रदता, पोषण स्तर तथा जलवायु सहनशीलता में उल्लेखनीय सुधार किया है।
निर्वाह कृषि से टिकाऊ आजीविका की ओर
दशकों तक निकोबार जिले में कृषि मुख्यतः वर्षा आधारित, पारंपरिक एवं निर्वाह कृषि तक सीमित रही। किसान पारंपरिक “तुहेत प्रणाली” (संयुक्त परिवार उद्यान) के अंतर्गत कंद फसलों पर आधारित मिश्रित खेती पर निर्भर थे, जिसमें फसल विविधता एवं उत्पादकता दोनों ही सीमित थीं। वैज्ञानिक फसल प्रबंधन, उन्नत किस्में, सिंचाई सुविधाएँ तथा आधुनिक कृषि तकनीकों का लगभग अभाव था।
खाद्य उपभोग की स्थिति भी सीमित थी, जिसमें मुख्यतः कंद फसलें, मछली एवं शूकर का मांस शामिल था, जबकि सब्जियों, विशेषकर हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन अत्यंत कम था। परिणामस्वरूप कृषक परिवारों को पोषण असुरक्षा, कम आय तथा सीमित आजीविका अवसरों जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता था।
इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए भाकृअनुप-कृषि विज्ञान केन्द्र निकोबार ने ऑन-फार्म ट्रायल (ओएफटी), फ्रंट लाइन डेमोंस्ट्रेशन (एफएलडी), प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा क्षेत्रीय तकनीकी सहायता के माध्यम से आवश्यकता आधारित हस्तक्षेप प्रारंभ किया, ताकि निकोबारी जनजातीय किसानों में वैज्ञानिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा दिया जा सके।

परिवर्तन को गति देने वाले वैज्ञानिक हस्तक्षेप
इन हस्तक्षेपों का उद्देश्य द्वीपीय पारिस्थितिकी एवं जनजातीय किसानों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप स्थान-विशिष्ट तकनीकों को बढ़ावा देना था। कई गांवों में 10 हैक्टर से अधिक क्षेत्र में समेकित एवं जलवायु-सहिष्णु कृषि प्रणालियों को प्रोत्साहित किया गया, जिससे वर्षभर आय एवं संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो सके।
मुख्य हस्तक्षेपों में शामिल थे:
• उन्नत सब्जी किस्मों का परिचय, जिनमें द्वीप भाकृअनुप-सीआईएआरआई बैंगन किस्में एवं आईआईएचआर किस्में शामिल हैं
• समेकित कृषि प्रणाली (आईएफएस) को बढ़ावा
• रसोई एवं पोषण उद्यानों की स्थापना
• जल संचयन संरचनाओं का निर्माण
• संरक्षित खेती हेतु कम लागत वाले पॉलीहाउस का विकास
• भूमि के कुशल उपयोग हेतु “द्वीप वर्टी-ग्रो” तकनीक का प्रसार
• जैविक एवं जैव-इनपुट्स का उपयोग
•मिनी पावर टिलर, हार्वेस्टिंग मशीन एवं ब्रश कटर जैसी लघु कृषि यंत्रीकरण तकनीकों का परिचयनियमित प्रशिक्षण कार्यक्रमों, प्रदर्शनों एवं परामर्श सेवाओं के माध्यम से किसानों में वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों एवं विविधीकृत आजीविका गतिविधियों को अपनाने का आत्मविश्वास विकसित हुआ।
परिवर्तन का नेतृत्व कर रहे किसान
इन हस्तक्षेपों का प्रभाव पैट्रिक जेरिमाह, एस्थर रेजिनल, लेस्ली, जैक्सन, मनोज निकोलस एवं जान मोहम्मद जैसे किसानों के जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जिन्होंने फसल उत्पादन, पशुपालन, शूकर पालन, कुक्कुट पालन, मधुमक्खी पालन एवं संरक्षित सब्जी उत्पादन को समेकित करते हुए सफलतापूर्वक समेकित कृषि पद्धतियों को अपनाया।
उन्नत तकनीकों एवं विविधीकृत कृषि उद्यमों को अपनाने से कृषि उत्पादकता एवं आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। चयनित किसानों के विश्लेषण से पता चला कि औसत वार्षिक आय हस्तक्षेप से पूर्व लगभग ₹47,742 थी, जो केवीके द्वारा संचालित तकनीकों को अपनाने के बाद बढ़कर लगभग ₹1,67,075 हो गई। इसी प्रकार औसत लाभ-लागत अनुपात 1.75 से बढ़कर 2.92 हो गया, जो बेहतर आर्थिक व्यवहार्यता एवं कृषि संसाधनों के कुशल प्रबंधन को दर्शाता है।
लाभार्थियों में किसान पैट्रिक जेरिमाह की वार्षिक आय ₹81,700 से बढ़कर ₹3,11,600 हो गई, जिसका श्रेय समेकित कृषि प्रणाली, उन्नत फसल किस्मों, पशुधन एकीकरण, द्वीप वर्टी-ग्रो तकनीक एवं जैव-इनपुट्स को दिया गया। इसी प्रकार एस्थर रेजिनल ने गहन सब्जी उत्पादन, पोषण उद्यान, जल संचयन एवं मधुमक्खी पालन गतिविधियों के माध्यम से घरेलू पोषण एवं आय में उल्लेखनीय सुधार किया।
पोषण, स्थिरता एवं सामुदायिक सहनशीलता में सुधार
आर्थिक लाभों के अतिरिक्त इन हस्तक्षेपों ने निकोबारी जनजातीय समुदायों में महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन भी लाए हैं। जो किसान पहले मुख्यतः कंद फसलों पर निर्भर थे, वे अब बैंगन एवं अन्य पोषक सब्जियों को अपने दैनिक आहार में शामिल कर रहे हैं, जिससे घरेलू पोषण सुरक्षा में सुधार हुआ है।
रसोई उद्यान एवं वर्टी-ग्रो प्रणालियों ने सीमित भूमि संसाधनों का कुशल उपयोग करते हुए वर्षभर ताजी सब्जियों की उपलब्धता सुनिश्चित की है। समेकित कृषि पद्धतियों ने आय के स्रोतों में विविधता लाकर किसानों की जलवायु एवं बाजार जोखिमों के प्रति संवेदनशीलता को कम किया है।
इस कार्यक्रम की सफलता ने द्वीप के अन्य किसानों को भी समान पद्धतियाँ अपनाने के लिए प्रेरित किया है। अब तक 20 से अधिक किसान केवीके द्वारा प्रस्तुत तकनीकों को अपना चुके हैं तथा आसपास के गांवों एवं जिले के अन्य द्वीपों में भी इन तकनीकों के प्रति रुचि लगातार बढ़ रही है।

पहचान एवं व्यापक प्रभाव
लाभार्थी किसानों के उल्लेखनीय प्रयासों एवं उपलब्धियों को व्यापक स्तर पर सराहा गया है। कई किसानों को जिला प्रशस्ति प्रमाणपत्र, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का इनोवेटिव फार्मर अवार्ड तथा भाकृअनुप-केन्द्रीय द्वीप कृषि अनुसंधान संस्थान का सर्वश्रेष्ठ किसान पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया।
भाकृअनुप-कृषि विज्ञान केन्द्र निकोबार के निरंतर प्रयासों ने देश के सबसे दूरस्थ द्वीपीय क्षेत्रों में कृषि अनुसंधान एवं खेत स्तर पर तकनीक अपनाने के बीच की दूरी को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह पहल समेकित कृषि, बेहतर पोषण, संसाधन संरक्षण एवं जलवायु-सहिष्णु कृषि के माध्यम से टिकाऊ जनजातीय आजीविका विकास का एक सफल मॉडल बनकर उभरी है।
आज कार निकोबार में हो रहा यह परिवर्तन इस बात का सशक्त उदाहरण है कि वैज्ञानिक हस्तक्षेप, सामुदायिक सहभागिता एवं निरंतर संस्थागत सहयोग किस प्रकार जनजातीय किसानों को सशक्त बनाकर ग्रामीण आजीविका को मजबूत कर सकते हैं तथा द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्र में टिकाऊ एवं आत्मनिर्भर कृषि की दिशा में मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय द्वीप कृषि अनुसंधान संस्थान)







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