21 अगस्त, 2026, नई दिल्ली
प्रेस सूचना ब्यूरो, महाराष्ट्र-गोवा क्षेत्र ने महाराष्ट्र के आकांक्षी जिलों के पत्रकारों के लिए नई दिल्ली में एक प्रेस टूर का आयोजन किया, जिसमें गढ़चिरौली, वाशिम, धाराशिव और नंदुरबार से तीन-तीन पत्रकार शामिल हुए। इस टूर के तहत पत्रकारों ने भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली का दौरा किया, ताकि भारतीय कृषि में उभरती चुनौतियों से निपटने के उद्देश्य से किए जा रहे कृषि अनुसंधान, तकनीकी प्रगति और नवाचारों के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सके। इस दौरे ने पत्रकारों को वैज्ञानिकों के साथ संवाद करने और यह समझने का अवसर प्रदान किया कि किस प्रकार कृषि अनुसंधान और तकनीकी हस्तक्षेपों को किसानों के लिए समाधान में परिवर्तित किया जा रहा है।
डॉ. आर.एन. पड़ारिया, संयुक्त निदेशक (प्रसार), भाकृअनुप-आईएआरआई, ने प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया और स्वतंत्रता के बाद से भारत की कृषि यात्रा के साथ-साथ भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की स्थापना एवं विकास के बारे में जानकारी दी। देश के शुरुआती वर्षों में खाद्य संकट को याद करते हुए उन्होंने बताया कि कृषि अनुसंधान, वैज्ञानिक हस्तक्षेपों और किसान-केन्द्रित प्रसार की भूमिका ने भारत को खाद्य की कमी वाले राष्ट्र से खाद्य-अधिशेष देश में बदलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

डॉ. पड़ारिया ने भारत में हरित क्रांति लाने में भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन के योगदान पर भी प्रकाश डाला। क्षेत्र-विशिष्ट दृष्टिकोणों की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने बताया कि आईसीएआर के संस्थान किसानों, राज्य विभागों और अन्य हितधारकों के साथ मिलकर स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप प्रौद्योगिकियों का विकास और प्रसार करते हैं। उन्होंने कहा कि जलवायु, जल उपलब्धता, मिट्टी की स्थिति और फसल प्रणालियों में अंतर के कारण स्थान-विशिष्ट समाधानों को आवश्यक बनाता है। इस संदर्भ में उन्होंने महाराष्ट्र के आकांक्षी जिलों के पत्रकारों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला, ताकि वे अपने-अपने क्षेत्रों में किसानों और ग्रामीण समुदायों तक प्रासंगिक कृषि प्रौद्योगिकियों और नवाचारों की जानकारी पहुंचा सकें।
प्रेस सूचना ब्यूरो, मुंबई की उप-निदेशक (मीडिया एवं संचार) सुश्री जयदेवी पुजारी स्वामी ने भाकृअनुप-आईएआरआई के प्रयासों की सराहना की और कृषि अनुसंधान, नवाचार एवं प्रौद्योगिकी के माध्यम से आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने में संस्थान के योगदान पर प्रकाश डाला।
प्रतिनिधिमंडल को भाकृअनुप-आईएआरआई पर एक वीडियो फिल्म भी दिखाई गई, जिसमें संस्थान की यात्रा, प्रमुख अनुसंधान उपलब्धियों और भारतीय कृषि के विकास में इसके योगदान को दर्शाया गया।
बातचीत के दौरान एक प्रमुख चर्चा महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में सोयाबीन की घटती उत्पादकता पर केंद्रित रही, जो विशेष रूप से फसल वृद्धि के महत्वपूर्ण चरणों के दौरान अपर्याप्त और अनियमित जल उपलब्धता के कारण प्रभावित हो रही है। वैज्ञानिकों ने नमी की कमी वाले क्षेत्रों के किसानों को कम अवधि वाली सोयाबीन किस्मों को अपनाने की सलाह दी। इसके साथ ही जीवन रक्षक सिंचाई, मल्चिंग और बेहतर भूमि विन्यास जैसी पूरक कृषि पद्धतियों को अपनाने की भी सलाह दी गई। पत्रकारों को कृषि अनुसंधान संस्थानों, कृषि विज्ञान केंद्रों और राज्य कृषि विभागों के माध्यम से उपलब्ध उपयुक्त किस्मों और प्रौद्योगिकियों के बारे में जानकारी का प्रसार करने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया।

प्रतिनिधिमंडल ने भारत में आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) खाद्य फसलों पर किए जा रहे अनुसंधान के संबंध में भी प्रश्न उठाए। वैज्ञानिकों ने ऐसे अनुसंधान को नियंत्रित करने वाले नियामक ढांचे और जीनोम एडिटिंग प्रौद्योगिकियों के उपयोग के माध्यम से फसलों की लचीलापन क्षमता तथा उत्पादकता में सुधार के उद्देश्य से किए जा रहे अध्ययनों के वैज्ञानिक औचित्य के बारे में जानकारी दी।
बातचीत के बाद प्रतिनिधिमंडल ने भाकृअनुप-आईएआरआई, नई दिल्ली स्थित संरक्षित खेती केन्द्र, एकीकृत कृषि प्रणाली और प्राकृतिक खेती सुविधाओं का दौरा किया। प्रतिनिधियों को ग्रीनहाउस आधारित हाइड्रोपोनिक खेती के बारे में जानकारी दी गई, जो जल-कुशल और वर्षभर खेती के लिए उपयोगी है। उन्हें एकीकृत कृषि मॉडल के बारे में भी बताया गया, जिसमें फसलों के साथ डेयरी, कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन, फल उत्पादन, कृषि वानिकी, मधुमक्खी पालन और बायोगैस को शामिल कर एक हेक्टेयर की कृषि इकाई से वर्षभर आय और रोजगार सृजित किया जाता है। इसके अलावा, प्राकृतिक खेती की उन पद्धतियों के बारे में भी जानकारी दी गई, जिनका उद्देश्य मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार, बाहरी आदानों पर निर्भरता कम करना और टिकाऊ कृषि उत्पादन को बढ़ावा देना है।
प्रेस टूर ने विशेष रूप से आकांक्षी जिलों में वैज्ञानिक संस्थानों, मीडिया और कृषक समुदायों के बीच संचार को मजबूत करने के महत्व को रेखांकित किया, ताकि उत्पादकता, स्थिरता और किसानों की आजीविका में सुधार के लिए स्थान-विशिष्ट कृषि प्रौद्योगिकियों और नवाचारों का व्यापक प्रसार सुनिश्चित किया जा सके।
(स्रोत: भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली)







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