जनजातीय समुदायों के छोटे और सीमांत किसानों के लिए खेती लंबे समय से अनिश्चितताओं के बीच संघर्ष और दृढ़ता की कहानी रही है। भारत के विभिन्न पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण बीज सामग्री तक सीमित पहुंच, वैज्ञानिक मार्गदर्शन की कमी और पारंपरिक, कम उपज वाली कृषि पद्धतियों पर निरंतर निर्भरता ने उत्पादकता को सीमित किया है। इसके कारण किसानों के लिए अपनी भूमि की पूरी क्षमता का उपयोग करना कठिन हो गया है। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए भाकृअनुप–केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-सीपीआरआई) अपनी जनजातीय उप-योजना (टीएसपी) के माध्यम से जनजातीय किसानों तक वैज्ञानिक आलू की खेती पहुंचाने के लिए काम कर रहा है। इसके अंतर्गत किसानों को कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए उन्नत प्रौद्योगिकियों, आवश्यक कृषि आदानों और व्यावहारिक ज्ञान से सुसज्जित किया जा रहा है।

यह समझते हुए कि कृषि संबंधी चुनौतियां विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों और खेती की परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग होती हैं, भाकृअनुप-सीपीआरआई ने मध्य प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड, तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर के गुरेज और हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति में 502 अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन (एफएलडी) आयोजित किए। इन प्रदर्शनों के माध्यम से वैज्ञानिक आलू उत्पादन पद्धतियों को प्रदर्शित किया गया, जिससे किसानों को खेतों की परिस्थितियों में उन्नत प्रौद्योगिकियों की संभावनाओं को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर मिला। इन प्रयासों के पूरक के रूप में संस्थान ने परिसर के भीतर और बाहर छह प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए, जिनसे गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन और आलू की उन्नत खेती तकनीकों में क्षमता निर्माण के माध्यम से 189 किसानों को लाभ हुआ।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि किसान प्राप्त ज्ञान को व्यावहारिक रूप दे सकें, इस पहल के अंतर्गत उनकी आवश्यक कृषि आदानों की महत्वपूर्ण जरूरतों को भी पूरा किया गया। उन्नत कृषि पद्धतियों को अपनाने में सहायता के लिए लगभग 200 क्विंटल बीज कंदों के साथ 100 स्प्रेयर, जैव उर्वरक, सूक्ष्म पोषक तत्व और छोटे कृषि उपकरण वितरित किए गए। खेतों में प्रदर्शन, व्यावहारिक प्रशिक्षण और आवश्यक कृषि आदानों को एक साथ उपलब्ध कराकर इस कार्यक्रम का उद्देश्य वैज्ञानिक ज्ञान और उसके व्यावहारिक अनुप्रयोग के बीच की खाई को पाटना था, जिससे जनजातीय किसान आलू की खेती के अधिक उत्पादक तरीकों को अपना सकें।

इन पहलों का प्रभाव खेतों में प्राप्त परिणामों में दिखाई दिया, जो पारंपरिक खेती की तुलना में आलू की उन्नत किस्मों की बेहतर संभावनाओं को दर्शाते हैं। उत्तराखंड में कुफरी संगम की खेती से 64.71 प्रतिशत अधिक उपज दर्ज की गई, जबकि झारखंड में कुफरी नीलकंठ से पारंपरिक पद्धतियों की तुलना में 66.67 प्रतिशत अधिक उपज प्राप्त हुई। ये उपलब्धियां इस बात को रेखांकित करती हैं कि जब उपयुक्त प्रौद्योगिकियों को प्रशिक्षण और आवश्यक कृषि आदानों की उपलब्धता का सहयोग मिलता है, तो विज्ञान-आधारित कृषि हस्तक्षेप उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
अपनी जनजातीय उप-योजना की पहलों के माध्यम से भाकृअनुप-सीपीआरआई जनजातीय किसानों को पारंपरिक खेती की सीमाओं से आगे बढ़कर आलू उत्पादन की उन्नत पद्धतियां अपनाने के नए अवसर उपलब्ध करा रहा है। विभिन्न कृषि क्षेत्रों तक वैज्ञानिक प्रौद्योगिकियां पहुंचाकर और उन्हें अपनाने के लिए किसानों की क्षमता मजबूत करके संस्थान कृषि के अधिक उत्पादक और सुदृढ़ दृष्टिकोण को आगे बढ़ा रहा है। यह दृष्टिकोण जनजातीय कृषक समुदायों की क्षमता को पहचानता है और बेहतर कृषि आजीविका के निर्माण के उनके प्रयासों को समर्थन देता है।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला)








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