3–4 सितंबर, 2026, हैदराबाद
“विकसित भारत के लिए तिलहन में आत्मनिर्भरता: नवाचार और नीतिगत एकीकरण” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय स्तर की विचार-मंथन कार्यशाला का आयोजन 3–4 सितंबर 2026 को भाकृअनुप–भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान, राजेंद्रनगर, हैदराबाद, में किया गया। कार्यशाला का संयुक्त आयोजन इंडियन सोसाइटी ऑफ ऑयलसीड्स रिसर्च, भाकृअनुप–आईआईओआर और भाकृअनुप–राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी (नार्म), हैदराबाद, द्वारा किया गया।
कार्यशाला में कृषि अनुसंधान संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, सरकारी एजेंसियों, बीज संगठनों, उद्योग, विस्तार एजेंसियों, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और देशभर के कृषक समुदायों के विशेषज्ञों एवं हितधारकों ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने तिलहन क्षेत्र की चुनौतियों और अवसरों पर विचार-विमर्श किया तथा विकसित भारत @ 2047 के विजन के अनुरूप तिलहन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए कार्रवाई-उन्मुख रोडमैप विकसित किया।

उद्घाटन सत्र 3 सितंबर को आयोजित किया गया। डॉ. आर.के. माथुर, निदेशक, भाकृअनुप–आईआईओआर, हैदराबाद, ने प्रतिभागियों का स्वागत किया, जबकि भाकृअनुप, डॉ. डी.के. यादव, उप महानिदेशक (फसल विज्ञान), नई दिल्ली, ने अध्यक्षीय संबोधन दिया। डॉ. एस.के. राव, पूर्व कुलपति, आरवीएसकेवीवी, ग्वालियर, ने मुख्य अतिथि के रूप में मुख्य संबोधन दिया।
कार्यशाला में डॉ. प्रभात कुमार, आयुक्त (बागवानी) एवं मिशन निदेशक, एनएमईओ, नई दिल्ली; प्रो. ए. गणेश कुमार, अध्यक्ष, कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी), नई दिल्ली; डॉ. वी.एस. जैतावत, कुलपति, कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर; डॉ. राम प्रताप सिंह, कुलपति, एमपीयूएटी, उदयपुर; डॉ. डी. राजी रेड्डी, कुलपति, एसकेएलटीजीएचयू; डॉ. शैक एन. मीरा, निदेशक, भाकृअनुप– अटारी, हैदराबाद; डॉ. ए.के. विश्वकर्मा, जेएनकेवीवी, जबलपुर; डॉ. डी.एम. हेगड़े, पूर्व निदेशक, भाकृअनुप–आईआईओआर; डॉ. वी. मुरलीधरन, पूर्व निदेशक, भाकृअनुप–डीजीआर, जूनागढ़; डॉ. एस.के. झा, सहायक महानिदेशक (ओपी), भाकृअनुप, नई दिल्ली; डॉ. रमन मीनाक्षी सुंदरम, निदेशक, भाकृअनुप–नार्म, हैदराबाद; डॉ. संजीव गुप्ता, कुलपति, सीएसएयूए&टी, कानपुर; डॉ. एस.के. बेरा, निदेशक, भाकृअनुप–आईआईजीआर, जूनागढ़; डॉ. गोपाल लाल, संयुक्त निदेशक, भाकृअनुप–नार्म, हैदराबाद; और डॉ. रेखा नायर, उप प्रमुख–प्रोग्राम-रूरल, आईसीआईसीआई फाउंडेशन सहित अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने भी सहभागिता की।

विषयगत सत्रों में तिलहन मूल्य श्रृंखला के महत्वपूर्ण क्षेत्रों को शामिल किया गया, जिनमें गुणवत्तापूर्ण बीज प्रणालियां, उन्नत किस्मों और प्रौद्योगिकियों का विकास एवं अंगीकरण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण एवं विस्तार, नीति एवं संस्थागत समर्थन, बाजार एवं मूल्य-श्रृंखला विकास, अनुसंधान–उद्योग संपर्क, प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन और किसान-केंद्रित हस्तक्षेप शामिल थे। प्रतिभागियों ने उत्पादन, उत्पादकता और लाभप्रदता बढ़ाने के साथ-साथ आयातित खाद्य तेलों पर भारत की निर्भरता कम करने के लिए अनुसंधान संस्थानों, बीज एजेंसियों, उद्योग, विस्तार संगठनों, एफपीओ और किसानों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया। अंतिम पूर्ण सत्र में विषयगत सत्रों के प्रतिवेदकों द्वारा प्रस्तुतियां दी गईं, जिसके बाद विचार-विमर्श और प्रमुख सिफारिशों तथा कार्रवाई-उन्मुख रोडमैप को अंतिम रूप दिया गया।
कार्यशाला में स्पीड ब्रीडिंग और ऑफ-सीजन नर्सरियों के माध्यम से तिलहनी फसलों के आनुवंशिक सुधार में तेजी लाने की सिफारिश की गई, जिसमें कम अवधि वाली, अधिक उपज देने वाली और बहु-तनाव-सहिष्णु किस्मों पर जोर दिया गया। उच्च क्षमता वाले क्षेत्रों की पहचान के लिए सापेक्ष उपज सूचकांक (आरवाईआई) और सापेक्ष प्रसार सूचकांक (आरएसआई) का उपयोग करते हुए जिला-, मौसम-, फसल प्रणाली- और फसल-विशिष्ट उपयुक्तता मानचित्रण करने, अग्रिम पंक्ति प्रदर्शनों (एफएलडी) के माध्यम से गैर-पारंपरिक क्षेत्रों में तिलहनों को बढ़ावा देने तथा धान-परती प्रणालियों में उनकी उपयुक्तता का आकलन करने का आह्वान किया गया। प्रतिभागियों ने 2030 और 2047 के रोडमैप के अनुरूप राज्यवार बीज रोलिंग योजनाओं के लिए केंद्र–राज्य के बीच मजबूत समन्वय पर भी जोर दिया। इसके लिए एफपीओ, एफपीसी,सहकारी समितियों, पीएसी और अन्य किसान समूहों की भागीदारी वाले PPPs के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण बीज की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बहु-मौसमी बीज ग्राम अवधारणा के कार्यान्वयन का समर्थन किया गया।

कार्यशाला में सहायक नीतियों और प्रौद्योगिकी प्रसार, मूल्य-श्रृंखला विकास, उच्च बीज प्रतिस्थापन दर (एसआरआर) और किस्म प्रतिस्थापन दर (वीआरआर) तथा उत्पादन को प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन के साथ एकीकृत करने के लिए सार्वजनिक, निजी, सहकारी और एफपीओ/एफपीसी हितधारकों के बीच अधिक समन्वय की भी आवश्यकता बताई गई।
इसमें पारंपरिक खाद्य तेलों के स्वास्थ्य और पोषण संबंधी लाभों के बारे में साक्ष्य-आधारित जानकारी तैयार करने और उसका प्रसार करने, NIN द्वारा अनुशंसित स्तरों के संदर्भ में उपभोग पैटर्न का आकलन करने तथा लक्षित हस्तक्षेपों और नीतिगत योजना के समर्थन के लिए उनके गैर-उपभोग संबंधी उपयोगों का दस्तावेजीकरण करने की भी सिफारिश की गई।
कार्यशाला ने उत्पादक, लाभप्रद और आत्मनिर्भर तिलहन क्षेत्र के लिए समन्वित रणनीतियां तैयार करने हेतु वैज्ञानिक, नीतिगत, उद्योग, विस्तार और किसान दृष्टिकोणों को एक साथ लाने के लिए राष्ट्रीय मंच प्रदान किया। इन सिफारिशों से खाद्य तेलों में भारत के आत्मनिर्भरता के लक्ष्य और विकसित भारत @ 2047 के विजन में योगदान मिलने की उम्मीद है।
(स्रोत: भाकृअनुप–भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान, राजेन्द्रनगर, हैदराबाद)







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