विकसित ईस्ट एगफूडटेक शिखर सम्मेलन 2026 में भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर ने पूर्वी भारत की जलीय कृषि पर उच्चस्तरीय पैनल चर्चा का किया नेतृत्व

विकसित ईस्ट एगफूडटेक शिखर सम्मेलन 2026 में भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर ने पूर्वी भारत की जलीय कृषि पर उच्चस्तरीय पैनल चर्चा का किया नेतृत्व

5 अगस्त, 2026, कोलकाता

भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई), बैरकपुर, ने कोलकाता के बिस्वा बांग्ला कन्वेंशन सेंटर में आयोजित विकसित ईस्ट एगफूडटेक शिखर सम्मेलन (वीईएटीएस 2026) के दौरान “ब्लू इकोनॉमी का विस्तार: पूर्वी भारत में जलीय कृषि का उदय” विषय पर आयोजित उच्चस्तरीय पैनल चर्चा का नेतृत्व और संचालन किया। इस सम्मेलन का आयोजन द बंगाल चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा किया गया था।

डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर, ने पैनल चर्चा का संचालन किया। इस चर्चा में अनुसंधान, अंतरराष्ट्रीय विकास तथा एग्री-टेक उद्यमिता क्षेत्रों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों ने भाग लिया। इस अवसर पर डॉ. डे ने कहा कि पैनल चर्चा ने पूर्वी भारत के लिए एक परिवर्तनकारी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है, जिसमें क्षेत्र के विशाल जलीय संसाधनों को केवल मछली उत्पादन के स्रोत के रूप में नहीं, बल्कि नवाचार, उद्यमिता, रोजगार सृजन, सुदृढ़ आजीविका और सतत आर्थिक विकास के शक्तिशाली माध्यम के रूप में विकसित करने की परिकल्पना की गई है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी और उद्यमिता के माध्यम से क्षेत्र के जल संसाधनों का प्रभावी उपयोग समावेशी विकास के नए अवसर प्रदान कर सकता है तथा पूर्वी भारत को ब्लू इकोनॉमी का प्रमुख केंद्र बना सकता है।

ICAR-CIFRI, Barrackpore Leads High-Impact Panel on Eastern Aquaculture at Viksit East AgFoodTech Summit 2026

चर्चा में इस बात पर बल दिया गया कि पूर्वी भारत अपनी समृद्ध मीठे जल की उपलब्धता, मत्स्य विविधता, जलीय कृषि की अपार संभावनाओं, तकनीकी क्षमताओं और विशाल ग्रामीण कार्यबल के आधार पर भारत की ब्लू इकोनॉमी का प्रमुख केंद्र बन सकता है। विशेषज्ञों ने कहा कि ब्लू इकोनॉमी का उद्देश्य केवल मछली उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि अधिक मूल्य संवर्धन, रोजगार सृजन, टिकाऊ आजीविका और स्वस्थ जलीय पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण भी होना चाहिए।

पैनल में विज्ञान-आधारित नवाचार, जलवायु-सहिष्णु उत्पादन प्रणाली, उन्नत मत्स्य प्रजनन एवं पोषण, डिजिटल प्रौद्योगिकियों, अनुसंधान-विस्तार-उद्योग साझेदारी को सुदृढ़ करने तथा समावेशी विकास मॉडल के माध्यम से पूर्वी भारत की जलीय कृषि को नई दिशा देने के महत्वपूर्ण उपायों पर चर्चा की गई। विशेष रूप से छोटे और सीमांत मत्स्य किसानों की चुनौतियों के समाधान तथा टिकाऊ तकनीकों को तेजी से अपनाने पर जोर दिया गया।

चर्चा का एक महत्वपूर्ण पहलू जलीय कृषि में डिजिटल परिवर्तन की भूमिका रहा। विशेषज्ञों ने बताया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), मोबाइल परामर्श सेवाएं और डेटा विश्लेषण जैसी तकनीकें उत्पादन क्षमता बढ़ाने, निर्णय लेने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने और बाजार तक पहुंच सुलभ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। पैनल ने मत्स्य प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग, डिजिटल विपणन, ई-कॉमर्स तथा जलीय कृषि आधारित उद्यमिता के क्षेत्र में महिलाओं और ग्रामीण युवाओं के लिए उपलब्ध अवसरों को भी रेखांकित किया।

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विशेषज्ञों ने कटाई उपरांत प्रबंधन, कोल्ड-चेन अवसंरचना, मूल्य संवर्धन, ट्रेसबिलिटी और आधुनिक प्रसंस्करण तकनीकों के महत्व पर भी बल दिया। उनका मानना था कि इन उपायों से नुकसान कम होगा, उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार होगा और किसानों की आय में वृद्धि होगी। साथ ही, इससे पूर्वी भारत का जलीय कृषि क्षेत्र प्राथमिक उत्पादन से आगे बढ़कर अधिक प्रतिस्पर्धी और एकीकृत मूल्य श्रृंखला की ओर अग्रसर हो सकेगा।

सत्र का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि पूर्वी भारत में जलीय कृषि का भविष्य वैज्ञानिक अनुसंधान, डिजिटल नवाचार, सतत व्यावसायिक मॉडल और सहयोगात्मक साझेदारियों के समन्वय में निहित है। इस समेकित दृष्टिकोण से मत्स्य किसानों को सशक्त बनाया जा सकता है, ग्रामीण युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित किए जा सकते हैं, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है तथा पूर्वी भारत को भारत की उभरती हुई ब्लू इकोनॉमी का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाया जा सकता है।

(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)

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