27 फरवरी, 2026, नई दिल्ली
भाकृअनुप–भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली ने 25–27 फरवरी 2026 तक आयोजित तीन दिवसीय पूसा कृषि विज्ञान मेला 2026 का सफल समापन किया। “विकसित कृषि – आत्मनिर्भर भारत” विषय पर आयोजित इस राष्ट्रीय स्तर के आयोजन ने कृषि नवाचार, संवाद तथा समाधान के लिए एक सशक्त मंच प्रदान किया। इसमें देशभर से किसान, वैज्ञानिक, नीति-निर्माता, कृषि-उद्यमी, सभी एफपीओ, नव-उद्यम, महिला किसान, ग्रामीण युवा और विद्यार्थी शामिल हुआ।
इस मेले का उद्घाटन 25 फरवरी, 2026 को केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा किया गया। उद्घाटन समारोह में श्री देवेश चतुर्वेदी, सचिव, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, डॉ. एम.एल. जाट, सचिव (डेयर) एवं महानिदेशक (भाकृअनुप), डॉ. डी.के. यादव, उप-महानिदेशक, फसल विज्ञान, डॉ. चेरुकमल्ली श्रीनिवास राव, निदेशक, भाकृअनुप-आईएआरआई, डॉ. आर.एन. पडारिया, संयुक्त निदेशक, विस्तार, सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

मंत्री ने उन्नत एवं जलवायु-सहिष्णु फसल किस्मों, संरक्षित खेती तकनीकों, शहरी एवं परिधीय कंटेनर गार्डनिंग, दलहन एवं तिलहन, तथा डिजिटल एवं यंत्रीकृत कृषि तकनीकों से संबंधित लाइव प्रदर्शन एवं प्रदर्शनी का अवलोकन किया। उन्होंने पूसा कृषि विज्ञान मेले को “किसानों का राष्ट्रीय कुंभ” बताते हुए कहा कि यह केवल प्रदर्शनी नहीं, बल्कि प्रयोगशाला से खेत तक विज्ञान पहुंचाने का सशक्त माध्यम है।
अपने संबोधन में श्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों को केवल “अन्नदाता” ही नहीं बल्कि “जीवनदाता” भी बताया और कहा कि भारत की कृषि प्रगति किसान और वैज्ञानिकों के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता, पोषण सुरक्षा, प्राकृतिक एवं आधुनिक तकनीकों के संतुलित उपयोग तथा वैश्विक बाजार के लिए गुणवत्तापूर्ण उत्पादन पर जोर दिया। साथ ही उर्वरक सब्सिडी और किसान-केन्द्रित योजनाओं को कृषि को लाभकारी और टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण बताया।

डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि भाकृअनुप “वन नेशन, वन एग्रीकल्चर, वन टीम” की भावना के साथ मांग-आधारित अनुसंधान को प्राथमिकता दे रहा है, ताकि किसानों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप समाधान विकसित किए जा सकें। उन्होंने दलहन एवं तिलहन मिशन, प्राकृतिक खेती, यंत्रीकरण और जलवायु-स्मार्ट कृषि को भविष्य की कृषि के प्रमुख स्तंभ बताया।
स्वागत भाषण में डॉ. चेरुकमल्ली श्रीनिवास रॉव ने कहा कि यह मेला किसान-वैज्ञानिक संवाद को मजबूत करने का सशक्त माध्यम है। देशभर से एक लाख से अधिक प्रतिभागियों की भागीदारी किसानों की विज्ञान-आधारित समाधानों को अपनाने की बढ़ती तत्परता को दर्शाती है।
दूसरे दिन फसल विविधीकरण, डिजिटल कृषि, एफपीओ–स्टार्टअप साझेदारी, कृषि विपणन एवं निर्यात जैसे विषयों पर तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों ने उन्नत किस्मों, डिजिटल सलाह, प्रिसिजन फार्मिंग और मूल्य संवर्धन की भूमिका पर चर्चा की, जिससे जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच उत्पादकता, लाभप्रदता तथा स्थिरता बढ़ाई जा सके। किसानों की सक्रिय भागीदारी ने इन सत्रों को अत्यंत व्यावहारिक बनाया।

मेले का समापन 27 फरवरी, 2026 को महिला एवं युवा उद्यमिता विकास तथा नवाचारी किसान सम्मेलन जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के साथ हुआ। वर्टिकल फार्मिंग, हाइड्रोपोनिक्स, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, फ्लोरीकल्चर, डेयरी, मूल्य संवर्धन और खाद्य प्रसंस्करण पर विशेष सत्र आयोजित किए गए, जिनसे कृषि को रोजगारोन्मुख और युवाओं व महिलाओं के लिए आकर्षक बनाने का संदेश दिया गया।
नवाचारी किसान सम्मेलन में किसानों ने पूसा तकनीकों को अपनाकर अधिक उत्पादन और आय प्राप्त करने के अपने अनुभव साझा किए। समापन समारोह में 25 राज्यों के किसानों को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का नवाचार करने वाले किसान के लिए पुरस्कार तथा साथी किसान सम्मान से सम्मानित किया गया, जो किसान-वैज्ञानिक साझेदारी की मजबूती को दर्शाता है।
समापन समारोह के मुख्य अतिथि, डॉ. आरएस. पडोदा, अध्यक्ष, टीएएएस एवं पूर्व महानिदेशक, भाकृअनुप, ने कहा कि कृषि अनुसंधान तभी सार्थक है जब वह खेतों में लागू हो और किसानों की आय बढ़ाने में सहायक बने। उन्होंने किसानों से वैज्ञानिक संस्थानों के मार्गदर्शन का अधिकतम लाभ उठाने का आग्रह किया।
डॉ. चेरुकमल्ली श्रीनिवास राव ने बताया कि इस वर्ष स्टॉलों, सहभागी संस्थाओं और आगंतुकों की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में अधिक रही। नि:शुल्क मृदा एवं जल परीक्षण, किसान परामर्श सेवाएं, एफपीओ तथा नव-उद्यम के लिए विशेष प्रदर्शनी, उन्नत बीज एवं रोपण सामग्री की उपलब्धता तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम मेले के प्रमुख आकर्षण रहे।

मेले में शामिल किसानों ने एक स्वर में कहा कि पूसा कृषि विज्ञान मेला उन्हें नई फसल किस्मों, तकनीकों और बाजार संपर्कों तक पहुंच प्रदान करता है। वैज्ञानिकों के साथ सीधा संवाद, लाइव प्रदर्शन और सफल किसानों के अनुभवों से उनकी खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने में मदद मिली है।पूसा कृषि विज्ञान मेला 2026 ने स्पष्ट रूप से दर्शाया कि विज्ञान-आधारित नवाचार, उद्यमिता और समावेशी दृष्टिकोण भारतीय कृषि को आत्मनिर्भर, प्रतिस्पर्धी और टिकाऊ बना सकते हैं। यह आयोजन न केवल वर्तमान चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करता है, बल्कि विकसित भारत के लक्ष्य को साकार करने में कृषि की निर्णायक भूमिका को भी सुदृढ़ करता है।
(स्रोत: भाकृअनुप–भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली)







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