भाकृअनुप-एनबीएफजीआर तथा धनामंजुरी विश्वविद्यालय ने मछली आनुवंशिक संसाधन संरक्षण, सतत जलीय कृषि और सामुदायिक आजीविका को बढ़ावा देने के लिए सहयोग किया
19 सितंबर, 2026, चंदेल, मणिपुर
भाकृअनुप–राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, लखनऊ तथा धनामंजुरी विश्वविद्यालय, मणिपुर के सहयोगात्मक प्रयासों से आज मणिपुर के चंदेल जिले के चाकपिकारोंग में एक जीवित मछली जीन बैंक और सामुदायिक जलीय कृषि केन्द्र का उद्घाटन किया गया।
यह केन्द्र चाकपी नदी के किनारे स्थानीय समुदायों के लिए जलीय कृषि-आधारित आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्वदेशी और स्थानिक मछली आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण, परिरक्षण, एक्स-सीटू रखरखाव और सतत प्रबंधन के लिए एक समुदाय-केन्द्रित सुविधा के रूप में स्थापित किया गया है। इस पहल से जलीय जैव विविधता संरक्षण में सामुदायिक भागीदारी मजबूत होने और क्षेत्र में सतत मत्स्य विकास में योगदान की उम्मीद है।

केन्द्र का संयुक्त रूप से उद्घाटन प्रो. डब्ल्यू. चांदबाबू सिंह, कुलपति, धनामंजुरी विश्वविद्यालय; डॉ. काजल चक्रवर्ती, निदेशक, भाकृअनुप-एनबीएफजीआर; और श्री रॉबर्ट सिंह क्षत्रिमायुम, आयुक्त एवं सचिव (मत्स्य), मणिपुर सरकार, ने किया। उद्घाटन के बाद मछली संरक्षण, मत्स्य विकास और सामुदायिक जलीय कृषि पर एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया।
इस अवसर पर धनामंजुरी विश्वविद्यालय और भाकृअनुप-एनबीएफजीआर ने एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) का आदान-प्रदान किया, जो मछली आनुवंशिक संसाधन संरक्षण, अनुसंधान, सामुदायिक जलीय कृषि, क्षमता निर्माण और सतत मत्स्य विकास में सहयोग को मजबूत करने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करता है।
“चाकपी नदी की मछलियां: विविधता, वर्गीकरण और संरक्षण” शीर्षक से एक पुस्तक का भी कार्यक्रम के दौरान विमोचन किया गया, जिसमें 107 मछली प्रजातियों से संबंधित जानकारी का दस्तावेजीकरण किया गया है। सामुदायिक पहुंच पहल के तहत, स्थानीय आजीविका को समर्थन देने और आईसीएआर-एनबीएफजीआर के एनईएच एवं एसटीसी के अंतर्गत सतत जलीय कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करने के लिए 100 से अधिक मछली किसानों को मछली चारा, मछली पकड़ने के जाल, बाल्टियां और अन्य जलीय कृषि सामग्री वितरित की गई।

संवाद सत्र के दौरान मणिपुर सरकार के मत्स्य निदेशक श्री टी. फुलेन ने जलीय संसाधनों के संरक्षण और सतत प्रबंधन से संबंधित व्यावहारिक जानकारी साझा की।
कार्यक्रम में चाकपिकारोंग के एसडीओ एमडी. ताजुद्दीन; डॉ. आर.के. जोतीन सिंह, रजिस्ट्रार, डीएमयू; प्रो. एल. हेमचंद्र सिंह, डीन, डीएमयू; टीएस. बेरेक, अध्यक्ष, एएनसीएसीएसडी; डॉ. बी. डी. शांगनिंगम, सहायक प्रोफेसर, डीएमयू सहित संकाय सदस्य, वैज्ञानिक, अधिकारी, मछली किसान और क्षेत्र के अन्य हितधारक उपस्थित रहे।
यह सहयोगात्मक पहल “सतत जलीय कृषि, सामुदायिक सशक्तिकरण और विकसित भारत की दिशा में नीली क्रांति” की व्यापक दृष्टि को दर्शाती है, जो जलीय जैव विविधता के संरक्षण को सामुदायिक भागीदारी, सतत मत्स्य पालन और आजीविका विकास से जोड़ती है।
(स्रोत: भाकृअनुप–राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, लखनऊ)







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