भाकृअनुप-आईआईएचआर, बेंगलुरु में प्रायद्वीपीय भारत के पादप आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन

भाकृअनुप-आईआईएचआर, बेंगलुरु में प्रायद्वीपीय भारत के पादप आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन

प्रायद्वीपीय भारत की समृद्ध आनुवंशिक विविधता जलवायु-सहनीय कृषि और खाद्य सुरक्षा की कुंजी

18 सितंबर, 2026, बेंगलुरु

“प्रायद्वीपीय भारत के पादप आनुवंशिक संसाधनों का उपयोग” विषय पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आज भाकृअनुप-भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु के डॉ. जी.एस. रंधावा सभागार में उद्घाटन किया गया। 17–19 सितंबर 2026 तक आयोजित की जा रही इस संगोष्ठी का आयोजन इंडियन सोसाइटी ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (आईएसपीजीआर) द्वारा भाकृअनुप-आईआईएचआर  और ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (टीएएएस) के सहयोग से किया जा रहा है। इसमें प्रायद्वीपीय भारत के पादप आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण, लक्षण-वर्णन और उपयोग पर चर्चा करने के लिए वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, नीति-निर्माताओं, विद्यार्थियों, किसानों और अन्य हितधारकों को एक साथ लाया गया है।

National Symposium on Harnessing Plant Genetic Resources of Peninsular India Inaugurated at ICAR-IIHR, Bengaluru

उद्घाटन सत्र में कर्नाटक के माननीय राज्यपाल श्री थावरचंद गहलोत मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। पद्म भूषण डॉ. आर. एस. परोदा, अध्यक्ष, आईएसपीजीआर और अध्यक्ष, टीएएएस; डॉ. डी.के. यादव, उप-महानिदेशक (फसल विज्ञान), भाकृअनुप; और डॉ. तुषार कांति बेहरा, निदेशक, भाकृअनुप-आईआईएचआर सहित कई विशिष्ट गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

सभा को संबोधित करते हुए श्री थावरचंद गहलोत ने जोर देकर कहा कि पादप आनुवंशिक संसाधन केवल जीन बैंकों में संरक्षित वैज्ञानिक सामग्री नहीं हैं, बल्कि भविष्य की कृषि, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, पारिस्थितिक संतुलन और ग्रामीण आजीविका का जैविक आधार हैं। उन्होंने तीन प्रमुख वैश्विक चुनौतियों—जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं पोषण असुरक्षा और जैव विविधता ह्रास—के समाधान में इनके महत्व को रेखांकित किया।

National Symposium on Harnessing Plant Genetic Resources of Peninsular India Inaugurated at ICAR-IIHR, Bengaluru

माननीय राज्यपाल ने पश्चिमी और पूर्वी घाट, दक्कन का पठार, तटीय क्षेत्र, शुष्क क्षेत्र तथा वर्षा आधारित और जनजातीय कृषि क्षेत्रों को समेटे प्रायद्वीपीय भारत की असाधारण जैविक संपदा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र स्थानीय नस्लों, पारंपरिक किस्मों, फसल के जंगली संबंधियों, औषधीय और सजावटी पौधों तथा स्वदेशी ज्ञान के समृद्ध भंडार का केंद्र है। उन्होंने आवास की हानि, जलवायु परिवर्तन और आक्रामक पादप प्रजातियों सहित विभिन्न खतरों को देखते हुए इन संसाधनों के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण, वैज्ञानिक लक्षण-वर्णन, संरक्षण और सतत उपयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।

पद्म भूषण डॉ. आर.एस. परोदा ने आनुवंशिक संसाधनों को मानवता की विरासत बताते हुए वैज्ञानिक समुदाय से मानव कल्याण के लिए जीन को डिकोड करके अधिक आनुवंशिक संसाधनों का पता लगाने का आह्वान किया। उन्होंने देश के प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में लगे किसानों और स्थानीय समुदायों को अधिक मान्यता देने का भी आग्रह किया। डॉ. परोदा ने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए राज्य स्तर पर मिशन स्थापित करने तथा उनके उचित दस्तावेजीकरण के माध्यम से आगे संरक्षण और प्रभावी उपयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।

National Symposium on Harnessing Plant Genetic Resources of Peninsular India Inaugurated at ICAR-IIHR, Bengaluru

डॉ. डी.के. यादव, उप-महानिदेशक (फसल विज्ञान), भाकृअनुप, नई दिल्ली, ने नवीन प्रजनन रणनीतियों के सहयोग से प्रभावी फसल सुधार के लिए संरक्षित आनुवंशिक संसाधनों के अधिक उपयोग का आह्वान किया। उन्होंने राष्ट्रीय जीन बैंक के माध्यम से पादप आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण में भाकृअनुप-राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (भाकृअनुप-एनबीपीजीआर) की भूमिका की सराहना की।

प्रारंभ में, डॉ. तुषार कांति बेहरा, निदेशक, भाकृअनुप-आईआईएचआर, बेंगलुरु ने गणमान्य व्यक्तियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया। डॉ. अनुराधा अग्रवाल, महासचिव, आएसपीजीआर ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

(स्रोत: भाकृअनुप-भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु)

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