28 अप्रैल, 2026, नई दिल्ली
भाकृअनुप–भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप–आईएआरआई), नई दिल्ली, ने आईएआरआई एलुमनाई एसोसिएशन (आईएए) के सहयोग से संस्थान में एक विशेषज्ञ व्याख्यान एवं संवाद सत्र का आयोजन किया। “शुष्कभूमि कृषि में जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन में नवाचार” विषय पर यह व्याख्यान प्रो. कदम्बोट सिद्धीक, हैकेट कृषि प्रोफेसर चेयर एवं निदेशक, द यूडब्ल्यूए इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर, यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया (UWA), ऑस्ट्रेलिया, द्वारा दिया गया।
आईएए के अध्यक्ष डॉ. आर.एस. परोड़ा ने औपचारिक रूप से वक्ता का परिचय देते हुए वैश्विक कृषि अनुसंधान में उनके महत्वपूर्ण योगदान तथा शुष्क भूमि कृषि प्रणालियों में उनके नेतृत्व को रेखांकित किया। उन्होंने आईएए की प्रमुख उपलब्धियों एवं राष्ट्र निर्माण तथा वैश्विक कृषि मंचों पर इसके योगदान का भी उल्लेख किया।

अपने उद्घाटन संबोधन में डॉ. चेरुकमल्ली श्रीनिवास राव, निदेशक एवं आईएए के मुख्य संरक्षक, भाकृअनुप–आईएआरआई, ने दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में संस्थान की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने सतत कृषि पद्धतियों के माध्यम से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने की आवश्यकता पर बल दिया तथा जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के समाधान में प्रभावी विज्ञान संप्रेषण के महत्व को रेखांकित किया।
अपने मुख्य व्याख्यान में प्रो. सिद्धीक ने कृषि प्रणालियों में जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन हेतु रणनीतियों पर विस्तार से चर्चा की, विशेष रूप से शुष्कभूमि एवं वर्षा आधारित क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की समस्या के समाधान की तात्कालिकता पर बल देते हुए चीन, ऑस्ट्रेलिया एवं भारत के अध्ययन उदाहरण प्रस्तुत किए, जिनसे सफल अनुकूलन उपायों को समझाया गया।
उन्होंने छात्रों के लिए उद्योगोन्मुख एवं अनुसंधान आधारित अवसरों को प्रोत्साहित करने हेतु भाकृअनुप–आईएआरआई की पहलों की सराहना की। युवा शोधकर्ताओं को प्रेरित करते हुए उन्होंने धैर्य एवं निरंतर प्रयास के महत्व पर जोर दिया तथा कहा कि चुनौतियाँ एवं असफलताएँ नवाचार प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा हैं।

प्रो. सिद्धीकी ने जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न वैश्विक चुनौतियों जैसे मौसमी अनिश्चितता में वृद्धि, कृषि उत्पादन क्षेत्रों में बदलाव तथा शुष्क भूमि पारिस्थितिकी तंत्र पर बढ़ते दबाव पर भी चर्चा की। उन्होंने किसानों के अनुभवजन्य ज्ञान के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि अनुकूलन रणनीतियों में पारंपरिक पद्धतियों को वैज्ञानिक हस्तक्षेप के माध्यम से समाहित एवं परिष्कृत किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन का भविष्य की कृषि उत्पादकता पर गहरा प्रभाव पड़ेगा, इसलिए स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप क्षेत्र-विशिष्ट रणनीतियाँ आवश्यक हैं। साथ ही, उन्होंने नीति समर्थन, उन्नत कृषि विज्ञान, फसल प्रजनन तथा संसाधनों के कुशल प्रबंधन को शामिल करते हुए समेकित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि शुष्कभूमि कृषि में लचीलापन बढ़ाया जा सके।
सत्र का समापन एक संवादात्मक चर्चा के साथ हुआ, जिसमें संकाय सदस्यों एवं छात्रों ने सक्रिय भागीदारी करते हुए जलवायु अनुकूल कृषि से जुड़ी उभरती चुनौतियों एवं संभावित समाधानों पर विचार-विमर्श किया।
(स्रोत: भाकृअनुप–भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली)







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