23–24 जुलाई, 2026, पटना
भाकृअनुप–पूर्वी क्षेत्र अनुसंधान परिसर (भाकृअनुप–आरसीईआर), पटना, की XXII अनुसंधान सलाहकार समिति (आरएसी) बैठक 23–24 जुलाई, 2026 को डॉ. ए.के. सिंह, पूर्व उप महानिदेशक (प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन), भाकृअनुप, नई दिल्ली, की अध्यक्षता में आयोजित की गई। बैठक में संस्थान की अनुसंधान उपलब्धियों की समीक्षा की गई तथा पूर्वी भारत में उभरती चुनौतियों का समाधान करने और किसानों की समृद्धि बढ़ाने के लिए कृषि अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास एवं प्रसार को सुदृढ़ करने हेतु रणनीतिक दिशा-निर्देश प्रदान किए गए।

बैठक में डॉ. सी.एल. आचार्य, पूर्व निदेशक, भाकृअनुप–भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान (भाकृअनुप–आईआईएसएस), भोपाल; डॉ. ए.एस. पंवार, पूर्व निदेशक, भाकृअनुप–भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप–आईआईएफएसआर), मोदीपुरम; डॉ. राकेश कुमार, सहायक महानिदेशक (कृषिशास्त्र, कृषि वानिकी, वानिकी एवं जलवायु परिवर्तन), भाकृअनुप, नई दिल्ली; डॉ. अनुप दास, निदेशक, भाकृअनुप–आरसीईआर, पटना, सहित संस्थान के प्रभागाध्यक्ष, वैज्ञानिक तथा कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके), बक्सर एवं रामगढ़ के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
बैठक को संबोधित करते हुए डॉ. ए.के. सिंह ने विशेष रूप से बिहार, झारखंड तथा व्यापक पूर्वी क्षेत्र के लघु एवं सीमांत किसानों के लिए संसाधन-कुशल एवं जलवायु-स्मार्ट कृषि पद्धतियों के माध्यम से भूमि एवं जल उत्पादकता बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने जल एवं पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार तथा लचीलापन एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिए सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने पर जोर दिया।

डॉ. राकेश कुमार, सहायक महानिदेशक, भाकृअनुप, ने संस्थान के महत्वपूर्ण अनुसंधान योगदानों की सराहना की तथा इस बात पर बल दिया कि भविष्य का अनुसंधान राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ निकटता से जुड़ा रहना चाहिए। उन्होंने जलवायु-स्मार्ट गांवों के विकास, कोयला खदान प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्वास तथा लघु एवं सीमांत किसानों की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रौद्योगिकियों के विकास के महत्व को रेखांकित किया।
अतिथियों का स्वागत करते हुए डॉ. अनुप दास, निदेशक, भाकृअनुप–आरसीईआर, ने संस्थान की प्रमुख अनुसंधान उपलब्धियों, चल रहे कार्यक्रमों तथा भविष्य की प्राथमिकताओं का अवलोकन प्रस्तुत किया। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि संस्थान केवल गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान सृजन के लिए ही नहीं, बल्कि विस्तार एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से प्रमाणित प्रौद्योगिकियों के प्रभावी हस्तांतरण को सुनिश्चित करने के लिए भी प्रतिबद्ध है। उन्होंने समिति को अवगत कराया कि धान परती प्रबंधन (Rice Fallow Management) संस्थान के प्रमुख कार्यक्रमों में से एक बनकर उभरा है, जो संसाधन संरक्षण प्रौद्योगिकियों तथा उन्नत धान, दलहन एवं तिलहन किस्मों के माध्यम से सतत कृषि सघनीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। इसके परिणामस्वरूप पिछले एक दशक में पूर्वी भारत में धान परती प्रणाली के अंतर्गत क्षेत्रफल में लगभग 15 लाख हैक्टर की कमी आई है।

आरएसी ने सतत धान परती सघनीकरण, एकीकृत कृषि प्रणाली (आईएफएस), जल-स्मार्ट कृषि, जलवायु-लचीली खेती, पशुधन एवं मत्स्य पालन, संसाधन-कुशल बागवानी, प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन तथा साक्ष्य-आधारित नीतिगत समर्थन के क्षेत्रों में अनुसंधान को सुदृढ़ करने हेतु रणनीतिक मार्गदर्शन प्रदान किया। समिति ने अनुसंधान कार्यक्रमों के व्यवस्थित प्रभाव आकलन की आवश्यकता पर भी बल दिया तथा पूर्वी भारत में प्रौद्योगिकियों की पहुंच और प्रभाव का विस्तार करने के लिए अधिक अंतर्विषयक एवं सहयोगात्मक अनुसंधान को प्रोत्साहित किया।
इससे पूर्व, आरएसी सदस्यों ने संस्थान के वैज्ञानिकों के साथ धान रोपाई में भाग लिया तथा चल रही अनुसंधान गतिविधियों की प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रायोगिक खेतों, अनुसंधान सुविधाओं एवं प्रयोगशालाओं का भ्रमण किया।
कार्यक्रम के अंतर्गत समिति ने आम एवं अमरूद सहित फलदार वृक्षों का पौधारोपण कर वृक्षारोपण अभियान में भी भाग लिया। आगंतुक सदस्यों के लिए संस्थान की प्रौद्योगिकियों एवं उत्पादों की प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर चार प्रकाशनों का विमोचन भी किया गया तथा सूक्ष्मजीवीय इनोक्यूलेशन के माध्यम से कृषि अपशिष्टों के वैज्ञानिक प्रबंधन हेतु Gbiome Private Limited के साथ एक समझौता ज्ञापन (एणओयू) पर हस्ताक्षर किए गए, जिससे सतत कृषि के लिए सहयोगात्मक प्रयासों को और मजबूती मिली।

तकनीकी सत्रों के दौरान प्रभागाध्यक्षों एवं केवीके प्रतिनिधियों ने फसल सुधार, कृषि प्रणालियों, भूमि एवं जल प्रबंधन, पशुधन एवं मत्स्य पालन, कृषि सामाजिक-अर्थशास्त्र तथा बक्सर एवं रामगढ़ के केवीके की गतिविधियों से संबंधित संस्थान की प्रमुख अनुसंधान उपलब्धियों, प्रौद्योगिकी विकास, विस्तार पहलों एवं भावी रणनीतियों को प्रस्तुत किया।
संस्थान की 25 वर्षीय यात्रा के दौरान प्राप्त उपलब्धियों पर संतोष व्यक्त करते हुए आरएसी सदस्यों ने पूर्वी भारत में किसानों के लाभ एवं कृषि विकास के लिए किए गए अनुसंधान की गुणवत्ता एवं प्रभाव की सराहना की। समिति ने भूमि एवं जल उत्पादकता बढ़ाने, जलवायु-स्मार्ट कृषि को प्रोत्साहित करने, गुणवत्तापूर्ण बीज एवं रोपण सामग्री उत्पादन, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के माध्यम से मत्स्य बीज एवं पशुधन उत्पादन, प्रौद्योगिकी प्रसार हेतु नीतिगत समर्थन को सुदृढ़ करने तथा प्रमुख कृषि जिंसों के लिए मूल्य श्रृंखलाओं के विकास पर अधिक जोर देने की अनुशंसा की।
(स्रोत: भाकृअनुप–पूर्वी क्षेत्र अनुसंधान परिसर, पटना)







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