भाकृअनुप-एमजीआईएफआरआई, मोतिहारी, ने खेत बचाओ अभियान के तहत मृदा स्वास्थ्य, फल गुणवत्ता और किसानों की आय बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक पपीता खेती को बढ़ावा दिया

भाकृअनुप-एमजीआईएफआरआई, मोतिहारी, ने खेत बचाओ अभियान के तहत मृदा स्वास्थ्य, फल गुणवत्ता और किसानों की आय बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक पपीता खेती को बढ़ावा दिया

30 जून, 2026, मोतिहारी, बिहार

देशव्यापी खेत बचाओ अभियान–2026 के अंतर्गत भाकृअनुप–महात्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-एमजीआईएफआरआई), मोतिहारी, ने बिहार के पूर्वी चंपारण एवं पश्चिमी चंपारण जिलों में वैज्ञानिक पपीता खेती पर किसान जागरूकता-सह-प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया। कार्यक्रम का उद्देश्य मृदा स्वास्थ्य-केन्द्रित बाग प्रबंधन, संतुलित पोषक तत्व उपयोग, समेकित कृषि प्रणाली तथा वैज्ञानिक फसल प्रबंधन को बढ़ावा देकर पपीता की उत्पादकता, फल गुणवत्ता एवं किसानों की लाभप्रदता में वृद्धि करना था।

कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों ने खेत बचाओ अभियान के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला तथा बताया कि पपीता सबसे अधिक लाभदायक फल फसलों में से एक है, क्योंकि इसमें रोपण के 8–10 माह के भीतर फल आना शुरू हो जाता है और 2–3 वर्षों तक उत्पादन जारी रहता है। किसानों को दीर्घकालिक मृदा उर्वरता बनाए रखते हुए अधिकतम उत्पादकता प्राप्त करने के लिए वैज्ञानिक उत्पादन प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।

वैज्ञानिकों ने बताया कि पपीता 22–35 डिग्री सेल्सियस तापमान, 1000–1500 मिमी वार्षिक वर्षा तथा 6.0–7.5 पीएच वाली अच्छी जल निकासयुक्त बलुई दोमट से दोमट मिट्टी में सर्वोत्तम प्रदर्शन करता है। किसानों को जलभराव से बचने की सलाह दी गई, क्योंकि पपीता अधिक मृदा नमी एवं जड़ रोगों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है। क्षेत्र के लिए रेड लेडी, पूसा डिलीशियस, पूसा ड्वार्फ, पूसा नन्हा, रांची ड्वार्फ तथा उपयुक्त ताइवान संकर किस्मों की अनुशंसा की गई।

तकनीकी सत्र के दौरान वैज्ञानिक बाग स्थापना पद्धतियों का प्रदर्शन किया गया। किसानों को सलाह दी गई कि पूर्वी भारत की परिस्थितियों में जून–जुलाई के दौरान 2.0 × 2.0 मीटर की दूरी पर पपीता का रोपण करें, जबकि जहाँ उपयुक्त हो वहाँ उच्च घनत्व रोपण प्रणाली में 1.8 × 1.8 मीटर की दूरी अपनाई जा सकती है। 60 × 60 × 60 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे तैयार कर उनमें 15–20 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद (एफवाईएम), 1 किलोग्राम नीम खली, 250 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 50 ग्राम ट्राइकोडर्मा को एफवाईएम के साथ मिलाकर भरने की सलाह दी गई, ताकि मृदा स्वास्थ्य में सुधार हो तथा मृदा जनित रोगों में कमी आए।

ICAR-MGIFRI, Motihari Promotes Scientific Papaya Cultivation under Khet Bachao Abhiyan to Enhance Soil Health, Fruit Quality, and Farmers' Income

वैज्ञानिकों ने उत्पादकता बनाए रखने के लिए संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन के महत्व पर बल दिया। किसानों को प्रति पौधा प्रतिवर्ष 250 ग्राम नाइट्रोजन (एन), 250 ग्राम फॉस्फोरस (पी₂ओ₅), 500 ग्राम पोटाश (के₂ओ) तथा 15–20 किलोग्राम एफवाईएम देने की सलाह दी गई, जिसे पूरे वृद्धि काल में 6–8 भागों में विभाजित कर देना चाहिए। साथ ही, पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने, मृदा में सूक्ष्मजीवीय गतिविधि सुधारने तथा उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए प्रति पौधा 50 ग्राम एजोटोबैक्टर, 50 ग्राम फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु (पीएसबी) तथा 2–3 किलोग्राम वर्मी कम्पोस्ट के समेकित उपयोग की भी अनुशंसा की गई।

वैज्ञानिकों ने इस बात पर विशेष बल दिया कि उर्वरकों के प्रयोग से पहले मृदा परीक्षण पहला कदम होना चाहिए। किसानों को मृदा परीक्षण की अनुशंसाओं के आधार पर जैविक खाद, जैव उर्वरक, फसल अवशेष पुनर्चक्रण, हरित खाद तथा रासायनिक उर्वरकों का समेकित उपयोग करने के लिए प्रेरित किया गया। अनुसंधानों से लगातार यह सिद्ध हुआ है कि अनुशंसित एनपीके मात्रा के साथ एजोटोबैक्टर, एजोस्पिरिलम तथा पीएसबी जैसे जैव उर्वरकों का प्रयोग केवल रासायनिक उर्वरकों की तुलना में पौध वृद्धि, पोषक तत्व अवशोषण, फल उत्पादन एवं फल गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार करता है।

किसानों को गर्मियों में प्रत्येक 5–7 दिन तथा सर्दियों में प्रत्येक 10–15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करने की सलाह दी गई तथा जहाँ संभव हो वहाँ ड्रिप सिंचाई अपनाने की अनुशंसा की गई, ताकि जल उपयोग दक्षता बढ़ाई जा सके। वैज्ञानिकों ने खरपतवार रहित थालों को बनाए रखने तथा 5–10 सेंटीमीटर मोटी जैविक मल्च बिछाने की सलाह भी दी, जिससे मृदा में नमी का संरक्षण, खरपतवार नियंत्रण तथा मृदा में कार्बनिक कार्बन की मात्रा बढ़ाई जा सके।

कार्यक्रम में पर्यावरण-अनुकूल कीट एवं रोग प्रबंधन पर भी विशेष बल दिया गया। किसानों को स्वस्थ एवं विषाणु-मुक्त पौधों का उपयोग करने तथा पपीता रिंग स्पॉट वायरस (पीआरएसवी) से संक्रमित पौधों को तुरंत हटाने एवं एफिड वाहकों का नियंत्रण करने की सलाह दी गई, ताकि रोग का प्रसार कम किया जा सके। तना एवं जड़ सड़न के प्रबंधन के लिए उचित जल निकास बनाए रखने तथा आवश्यकता पड़ने पर ट्राइकोडर्मा अथवा अनुशंसित फफूंदनाशकों के उपयोग पर बल दिया गया। फल मक्खी के नियंत्रण के लिए वैज्ञानिकों ने मेथाइल यूजेनॉल ट्रैप लगाने तथा संक्रमित फलों को नियमित रूप से एकत्र कर नष्ट करने की सलाह दी।

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वैज्ञानिकों ने आगे सलाह दी कि दूरस्थ बाजारों के लिए पपीता फलों की तुड़ाई तब की जाए जब छिलके का 25–30 प्रतिशत भाग पीला हो जाए, जबकि स्थानीय बाजारों के लिए 50–75 प्रतिशत पीला होने पर तुड़ाई की जाए, ताकि बेहतर फल गुणवत्ता एवं बाजार मूल्य प्राप्त हो सके। किसानों को बताया गया कि वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाने से 60–100 टन प्रति हैक्टर फल उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है, जबकि गहन प्रबंधन के अंतर्गत उच्च उत्पादक संकर किस्मों से 100–150 टन प्रति हैक्टर तक उत्पादन संभव है।

कार्यक्रम का समापन इस सशक्त संदेश के साथ हुआ कि स्वस्थ मिट्टी, संतुलित पोषण, उचित जल निकास, कुशल सिंचाई, समेकित कीट प्रबंधन तथा वैज्ञानिक बाग प्रबंधन लाभकारी एवं सतत पपीता खेती के प्रमुख आधार हैं। किसानों ने व्यावहारिक अनुशंसाओं की सराहना की तथा खेत बचाओ अभियान–2026 के अंतर्गत मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन एवं समेकित बागवानी पद्धतियों को अपनाने की इच्छा व्यक्त की।

इस कार्यक्रम ने बिहार में वैज्ञानिक परामर्श, किसान क्षमता निर्माण तथा सतत मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन के माध्यम से जलवायु-अनुकूल फल उत्पादन प्रणालियों को बढ़ावा देने के प्रति आईसीएआर-एमजीआईएफआरआई की प्रतिबद्धता को पुनः सुदृढ़ किया।

(स्रोत: भाकृअनुप–महात्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी, बिहार)

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