भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर ने देशी कैटफिश के पुनर्जीवन तथा आर्द्रभूमियों के पुनरोद्धार के तहत चमटा मत्स्य फसल मेला में प्रदर्शित की अपनी सफलता

भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर ने देशी कैटफिश के पुनर्जीवन तथा आर्द्रभूमियों के पुनरोद्धार के तहत चमटा मत्स्य फसल मेला में प्रदर्शित की अपनी सफलता

22 जून, 2026, उत्तर 24 परगना, बैरकपुर

अंतर्देशीय मत्स्य संरक्षण तथा ग्रामीण आजीविका के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-सीआईएफआरआई), बैरकपुर, ने वर्ल्डफिश के साथ अपने सहयोगात्मक परियोजना के अंतर्गत विज्ञान-आधारित मत्स्य संवर्धन कार्यक्रम के माध्यम से चमटा आर्द्रभूमि में उच्च मूल्य वाली देशी कैटफिश आबादी के पुनर्स्थापन का सफल प्रदर्शन किया।

इस उपलब्धि का प्रदर्शन चमटा आर्द्रभूमि में आयोजित मत्स्य फसल मेला एवं वैज्ञानिक–मत्स्यजीवी संवाद कार्यक्रम के दौरान किया गया, जहाँ छह माह के वैज्ञानिक पेन कल्चर कार्यक्रम के बाद 387 किलोग्राम देशी कैटफिश (Mystus cavasius) की सफल उत्पादन किया गया। औसतन 2.28 ग्राम वजन वाली मछलियों को संवर्धन के लिए छोड़ा गया था, जो कटाई के समय औसतन 33.6 ग्राम वजन तक पहुँच गईं। यह उनकी उच्च जीवित रहने की क्षमता तथा उत्कृष्ट वृद्धि को दर्शाता है। इसके बाद इन्हें स्टॉक संवर्धन एवं जैव विविधता संरक्षण के उद्देश्य से आर्द्रभूमि में छोड़ा गया।

उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सिफरी, ने कहा कि देशी मत्स्य संसाधनों का विज्ञान-आधारित पुनर्स्थापन अब केवल संरक्षण की पहल नहीं रह गया है, बल्कि यह एक रणनीतिक विकास आवश्यकता बन चुका है, जो एक साथ क्षतिग्रस्त आर्द्रभूमियों के पुनर्जीवन, मत्स्यजीवियों की आय में वृद्धि, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ करने तथा भारत की समृद्ध जलीय जैव विविधता को भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने में सक्षम है। उन्होंने आगे कहा कि इस प्रकार के समेकित एवं विज्ञान-आधारित हस्तक्षेप विकसित भारत @2047 के दृष्टिकोण के अनुरूप हैं, जो नवाचार, सामुदायिक भागीदारी तथा प्राकृतिक संसाधनों के उत्तरदायी प्रबंधन के माध्यम से सतत आजीविका, पारिस्थितिकीय लचीलापन तथा सशक्त ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा देते हैं। डॉ. डे ने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान को जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन के साथ समन्वित करके भारत जलवायु-लचीले जलीय पारिस्थितिकी तंत्र विकसित कर सकता है, जो समावेशी आर्थिक विकास, पर्यावरणीय स्थिरता तथा राष्ट्र की दीर्घकालिक विकास आकांक्षाओं में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

श्री प्रणय बाला, प्रबंधक, चमटा मत्स्यजीवी सहकारी समिति ने कहा कि इस वैज्ञानिक हस्तक्षेप से न केवल मत्स्यजीवियों की आय में वृद्धि हुई है, बल्कि आर्द्रभूमि में मूल्यवान देशी मछली प्रजातियों के पुनर्जीवन में भी सहायता मिली है।

यह पहल दो प्रीमियम देशी कैटफिश प्रजातियों Mystus cavasius तथा Mystus tengara के पारिस्थितिकीय पुनर्स्थापन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस अभिनव रणनीति के अंतर्गत मछली बीजों को पहले संरक्षित पेन घेरों में पाला गया और उसके बाद उन्हें खुली आर्द्रभूमि में छोड़ा गया, जिससे प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी जीवित रहने की क्षमता तथा सफल स्थापना में उल्लेखनीय सुधार हुआ।

भाकृअनुप-सिफरी ने एचडीपीई पोल एवं परभक्षी-रोधी जालों का उपयोग कर वैज्ञानिक पेन निर्माण, जल एवं मृदा गुणवत्ता की नियमित निगरानी, मछली स्वास्थ्य प्रबंधन तथा पोषण संतुलित केजग्रो फ्लोटिंग फीड उपलब्ध कराने सहित संपूर्ण तकनीकी सहयोग प्रदान किया। स्थानीय मत्स्यजीवियों को वैज्ञानिक भोजन प्रबंधन, पेन रखरखाव तथा निगरानी का प्रशिक्षण भी दिया गया, जिससे संरक्षण प्रयासों में समुदाय की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित हुई।

जैव विविधता संरक्षण के अतिरिक्त इस हस्तक्षेप ने आर्द्रभूमि पर निर्भर समुदायों के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक अवसर भी सृजित किए हैं। जहाँ Mystus tengara का बाजार मूल्य भारतीय प्रमुख कार्प मछलियों की तुलना में चार गुना से अधिक है, वहीं Mystus cavasius लगभग तीन गुना अधिक मूल्य प्राप्त करती है, जिससे स्थानीय मत्स्यजीवियों को उल्लेखनीय रूप से बेहतर आर्थिक लाभ मिल रहा है।

चमटा मॉडल को सामुदायिक नेतृत्व एवं विज्ञान-समर्थित अंतर्देशीय मत्स्य प्रबंधन के एक विस्तार योग्य उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है, जो जैव विविधता संरक्षण को सतत आजीविका सृजन के साथ एकीकृत करता है तथा भारत के अंतर्देशीय जलीय पारिस्थितिकी तंत्रों में लघु देशी मछली प्रजातियों के पुनर्स्थापन के लिए एक आशाजनक मार्ग प्रस्तुत करता है।

(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर, कोलकाता)

×