11–15 सितंबर, 2026, पश्चिम बंगाल
भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर के वैज्ञानिकों ने पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर के चांदीपुर–नंदीग्राम क्षेत्र में झींगा पालन इकाइयों में संवर्धित व्हाइटलेग झींगा (Litopenaeus vannamei) की बड़े पैमाने पर मृत्यु की रिपोर्ट के बाद क्षेत्र-स्तरीय रोग निगरानी और नैदानिक जांच की।
यह जांच जलीय पशु रोगों के लिए राष्ट्रीय निगरानी कार्यक्रम (एनएसपीएएडी) के तहत मृत्यु की प्रकृति और संभावित कारणों का आकलन करने तथा प्रभावित क्षेत्र में झींगा किसानों के बीच रोग की तैयारी और प्रबंधन को मजबूत करने के लिए की गई।

भाकृअनुप-सिफरी की टीम, जिसमें डॉ. विकास कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक और श्री असीम जाना, तकनीकी अधिकारी शामिल थे, ने भाकृअनुप-सिफरी के डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, के मार्गदर्शन में कई प्रभावित तालाबों का निरीक्षण किया। टीम ने नैदानिक और महामारी विज्ञान संबंधी संकेतों, तालाबों की स्थिति, पालन पद्धतियों, फार्म के बुनियादी ढांचे और जैव-सुरक्षा उपायों का दस्तावेजीकरण किया। मृत और मरणासन्न झींगों की जांच की गई तथा विस्तृत प्रयोगशाला जांच के लिए प्रतिनिधि झींगा, पर्यावरणीय और संबंधित नमूने एकत्र किए गए।
प्रारंभिक क्षेत्रीय अवलोकनों और स्क्रीनिंग से Enterocytozoon hepatopenaei (EHP) संक्रमण और रनिंग मॉर्टेलिटी सिंड्रोम (RMS) की संभावित भूमिका का संकेत मिला। हालांकि, वैज्ञानिकों ने जोर दिया कि ये अवलोकन प्रारंभिक हैं और इनसे किसी पुष्ट निदान का निष्कर्ष नहीं निकलता। निश्चित आकलन के लिए आगे रोगजनक-विशिष्ट प्रयोगशाला परीक्षण और हिस्टोपैथोलॉजिकल जांच की आवश्यकता होगी।
जांच में रोग से संबंधित मृत्यु में जल की गुणवत्ता, तालाब की तली की स्थिति और फार्म प्रबंधन के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। घुलित ऑक्सीजन और pH में उतार-चढ़ाव, अपर्याप्त कुल क्षारीयता, अधिक जैविक भार और तल पर अपशिष्ट का जमाव झींगा के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है और संभावित रूप से रोग के प्रति संवेदनशीलता बढ़ा सकता है।
तत्काल जोखिम-प्रबंधन उपाय के रूप में, किसानों को नरभक्षण और रोगजनकों के संभावित प्रसार को न्यूनतम करने के लिए मृत और मरणासन्न झींगों को तुरंत हटाने और सुरक्षित तरीके से निपटाने की सलाह दी गई। उन्हें जहां व्यावहारिक हो, प्रभावित और अप्रभावित तालाबों के बीच झींगा, पानी, उपकरण और कर्मियों की आवाजाही को प्रतिबंधित करने की भी सलाह दी गई।

वैज्ञानिकों ने जल की स्थिर गुणवत्ता बनाए रखने के लिए नियमित साइफनिंग और संचित जैविक पदार्थ, मल सामग्री तथा अन्य तल अपशिष्ट को हटाने के साथ-साथ लगातार निगरानी और उचित वातन की सिफारिश की।
किसानों को आवश्यकता-आधारित आहार देने, अधिक आहार देने से बचने तथा मृत्यु की घटनाओं के दौरान झींगों मछली के व्यवहार और आहार के प्रति प्रतिक्रिया की बारीकी से निगरानी करने की भी सलाह दी गई। झींगों की स्थिति, जल की गुणवत्ता और जैवभार के आधार पर, तीव्र मृत्यु की घटनाओं के दौरान अस्थायी रूप से एक या दो आहार चक्र कम करने या छोड़ने पर विचार किया जा सकता है।
जांच पर विचार व्यक्त करते हुए डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सिफरी, ने जलीय कृषि में रोग की तैयारी और निगरानी को मजबूत करने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने टिकाऊ जलीय कृषि के लिए प्रारंभिक रोग निगरानी, वैज्ञानिक निदान, पर्यावरणीय निगरानी, उचित तालाब प्रबंधन और मजबूत जैव-सुरक्षा उपायों को एकीकृत करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
उन्होंने साक्ष्य-आधारित रोग प्रबंधन और जिम्मेदार स्वास्थ्य पद्धतियों के महत्व पर भी जोर दिया तथा एंटीबायोटिक्स और रसायनों के अंधाधुंध उपयोग के खिलाफ चेतावनी दी। जांच में प्रारंभिक चेतावनी, रोकथाम और तैयारी के लिए एक सक्रिय प्रणाली के रूप में रोग निगरानी को मजबूत करने की आवश्यकता रेखांकित हुई।

क्षेत्रीय जांच के साथ-साथ, भाकृअनुप-सिफरी ने झींगा पालक किसानों और स्थानीय हितधारकों के लिए एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें प्रारंभिक रोग रिपोर्टिंग, नियमित निगरानी, जल-गुणवत्ता की निगरानी, फार्म स्वच्छता, जैव-सुरक्षा और वैज्ञानिक जानकारी पर आधारित स्वास्थ्य प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया गया।
किसानों को विशेष रूप से पुष्ट निदान और पेशेवर मार्गदर्शन के बिना एंटीबायोटिक्स, रसायनों या अन्य उपचारात्मक पदार्थों के अंधाधुंध उपयोग के खिलाफ चेतावनी दी गई।
भाकृअनुप-सिफरी की टीम ने जोर दिया कि झींगा मछली के जलीय कृषि में प्रभावी रोग प्रबंधन के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, जिसमें रोगजनक का पता लगाना, पर्यावरणीय निगरानी, जैव-सुरक्षा और उचित पालन-पोषण पद्धतियों का संयोजन शामिल हो।
पूर्व मेदिनीपुर में झींगा मछली की मृत्यु की घटना का अंतिम आकलन जारी प्रयोगशाला जांच के परिणामों के आधार पर किया जाएगा। नैदानिक निष्कर्ष उपलब्ध होने के बाद कृषक समुदाय के लिए आगे स्थल-विशिष्ट प्रबंधन संबंधी सिफारिशें जारी की जाएंगी।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)







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